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क्या है सनातन धर्म?

सनातन का अर्थ है, शाश्वत। जो सदा है, सदा रहेगा और जब हम इस सत्य के मानक पर विचार करेंगे, कोई मनुष्य निर्मित आचार संहिता या पूजा इबादत की व्यवस्था इसमें नहीं आएगी। भला एक नश्वर मनुष्य शाश्वत नियमों की उत्पत्ति किस प्रकार कर सकता है?
इसका उत्तर रामायण महाभारत या पुराण और कर्मकांड या पूजा साधना विधियों या परम्परा गत मठों आश्रमों में नहीं मिलेगा। न ही भांगड़ा और नागिन डांस करने वाले महान बाबाओं के पास मिलेगा। ये सभी आपकी आस्था भूना कर भगवान बने बैठे हैं। रामानुज, शंकराचार्य, अघोर, आदि के परम्परागत शिष्य नहीं जानते कि उनके गुरु का विषय क्या था। वे साधना विधि , पूजा और कर्मकांड के पन्ने समझाने लगते हैं, पर उस सब्जेक्ट की चर्चा तक नहीं करते, जो लोकिक धर्म के सभी क्षेत्रों का जनक महा विज्ञान है।

आप उपनिषद, पढ़िए, कहीं किसी उपनिषद में यह नहीं मिलेगा। किसी ऋषि का सब्जेक्ट यह सब नहीं रहा। वे विज्ञान के अन्वेषक थे और उन्होंने वही बताया है। मूर्ख न जानने वाले पंडित पुरोहितों ने विज्ञान विज्ञान कह कर ऐसी ऐसी अनर्गल बातें शुरू कर दीं, कि इसका वास्तविक विज्ञान हास्यप्रद बन गया। कोई चीज वैज्ञानिक है या नहीं, यह कहने से नहीं प्रमाणित करने से होता है, पर तब ३३ वर्ष मेरी तरह हर बात को हाशिए पर रख कर मेहनत करनी होती है। मेरे साईट या पुस्तकों से चोरी करके महागुरु बन कर या या धर्म ग्रंथों को रट कर गुरु बनने से वह प्राप्त नहीं हो सकता। चोरी कर लोगे पर साबित कहां से करोगे। पर ये तो जनता को ठगते भर है।।साबित करने की जगह आस्था बता कर पल्ला झाड़ लेटें हैं।
इसका उत्तर उपनिषदों और ऋषियों की मूल पुस्तकों या तंत्रचार्यो के बड़े आचार्यों के ग्रंथों में मिलेगा कि इनका सब्जेक्ट क्या था। यद्यपि यह ओपन या विस्तृत या तकनीकी तौर पर नहीं व्यक्ति किया गया है, क्योंकि यह ब्रह्मविद्या है और परम गोपनीय है।आधुनिक शब्दों में यह एक सुपर एटॉमिक पावर साइंस है, जो सृष्टि के सभी रहस्यों को बताया है। कुछ ऐसे सत्य जो आधुनिक वैज्ञानिक जगत को हत प्रभ कर दे।
पर हम एक ऐसे देश में हैं, जो अपनी किसी बात को पश्चिम की अपेक्षा घटिया मानता है और देखना समझना भी नहीं चाहता।
अपने ऋषियों का उद्देश्य टारगेट देखिए समझ में आ जाएगा कि वे किस बात पर परिश्रम कर रहे थे। उनका विषय प्रकृति अर्थात ब्रह्मांड और इसमें चल रही इस दुन इस जीव और उसके संसार का रहस्य जानना चाहते थे।
। वे ब्रह्मांड और इसके फार्मेशन पर तर्क कर रहे थे। क्योंकि तब वाद विवाद से ही सत्य स्थापित होते थे। जो ये गुरु बनें आपको ठग रहें हैं, उन्हें पता है कि कणाद का परमाणु वाद, आचार्य शंकर का माया वाद, उपनिषदों – गीता का अद्वैत वाद, रामानुज का द्वैत वाद और ढेर सारे ऋषियों का विशिष्ट अद्वैत क्या है? क्या है गौतम का न्याय और शैवचार्यो का शिव और अघोर?
कहानियों फैंटम कथाओं में इन रहस्यों को टूट फूटे रूप में व्यक्त किया गया है, पर हम उन कहानियों में सत्य तलाश रहें है। हम पंचतंत्र को उस तरह नहीं पढ़ते, पर अपनी धार्मिक कथाओं को उसी तरह पढ़ते हैं, सुनते हैं। कारण स्पष्ट है। कुछ लोग कथाओं की दुनिया बना कर ही व्यक्तित्व, धन, आदर, आदर सब प्राप्त करतें हैं। वे सत्य स्थापित ही नहीं होने देते। उन्हें पता नहीं भी नहीं होता। उसे जानने के लिए योग्यता परिश्रम दोनों की जरूरत होती है।
सनातन धर्म कोई आस्था या अंध आस्था नहीं है।
आधुनिक युग में जिसे धर्म कहा जाता है, यह वह भी नहीं है। आज की परिभाषा में यह सृष्टि विज्ञान है, जिसका प्रारंभ एक नन्हें परमाणु की उत्पत्ति से शुरू होता है, जो ब्रह्मांड बन जाता है, कैसे, किस प्रकार यह है इसका विषय।

सभी ग्रह , उपग्रह, चांद, तारे, निहारिका से क्रम से होते जीवन मृत्यु से ले कर हर ग्रह की दुनिया का हर रहस्य बताने वाला यह विज्ञान कहता है कि कुछ भी अनायास या आकस्मिक नहीं है। ये नियमों से बंधे उत्पन्न होते हैं, नियमों से ही क्रिया करते हुए पोषण करतें है और नियमों से ही नष्ट हो जातें है। ये नियम ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय एक एक कर उत्पन्न होते हैं और उसकी आंतरिक हर इकाई की उत्पत्ति से विनाश तक पर लागू होते हैं। किसी भी इकाई की ऊर्जा संरचना, उसकी क्रिया , उसके विनाश के नियमों या क्रिया के प्राकृतिक तरीके में कोई अंतर नहीं है, न संरचनात्मक या क्रियात्मक कोई अंतर है, न इनपर लागू नियमों में अंतर है।
ये नियम ब्रह्मांड के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होते, एफ
नए ब्रह्मांड में फिर एक एक कर उत्पन्न हो जातें है।और वही होते हैं। हमारा ब्रह्मांड कोई अजूबा नहीं है। ऐसे ब्रह्मांड उत्पन्न होते ही राहतें है।
यह है सनातन धर्म, जो परमात्मा से उत्पन्न होता है और इन्हीं नियमों से सब जाना पाया जा सकता है, क्योंकि दूसरा कोई नियम है ही नहीं।

यदि आप पढ़े लिखे हैं। तो यह बताइए कि इसमें क्या है, जो आस्था का विषय है? मैंने हर तरह से परीक्षण किया है। यह सच में यही है।
एक विवाद परमात्मा पर है, पर उसका कारण है, फिर वही कथा। इसे आइंस्टीन के मूल तत्व के रूप में समझना चाहेंगे, तभी समझ में आएगा। शायद आइंस्टीन को भी नहीं मालूम था कि हमारे तमाम उपनिषदों में इसे तत्व ही कहा गया है। यह तो और भी अदभुत है।

Note- यहां सब नहीं बता सकता। तायपिंग की समस्या है। मैंने चोरों के डर से अपनी साइट पर पोस्टिंग बन्द कर दी थी। अब उनको पकड़ने का पूरा इंतजाम कर दिया है। विस्तृत जानकारी

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