महाकाल क्या है? महाकाल का सनातन रहस्य और विज्ञान

महाकाल क्या है?
धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

महाकाल क्या है? महाकाल को सदाशिव का ही दूसरा रूप कहा गया है। सबसे पहले योनि रूपा आद्याकाली उत्पन्न होती है। इनकी आवेशीय क्षुधा को शांत करने के लिए इन्ही की एक प्रतिकृति उल्टी और विपरीत आवेश से युक्त उत्पन्न होती है। इन दोनों के मिलन से एक पॉवर-सर्किट बनता है और कुछ निश्चित नियमों से क्रिया करते हुए अपना विस्तार करता हुआ ब्रह्माण्ड के रूप में विकसित होता है। सभी मार्ग में सभी आचार्यों, ऋषियों ने इसी विज्ञान को अलग-अलग ढंग से कहा है। इस पॉवर-सर्किट का विकास चाहे जितना बड़ा हो जाए; इसकी संरचना का सर्किट और क्रियाएं निश्चित होती है।

यह पॉवर सर्किट सदाशिव/परमात्मा/परब्रह्म  या ‘0’ में उसी की धाराओं से उत्पन्न होता है; जिस प्रकार वायु में चक्रवात, पानी में भँवर उत्पन्न होता है। शांत वायु में उत्पन्न होने वाले चक्रवातों की भयानकता से सभी परिचित हैं। इसमें भयानक शक्तियों का उदय होता है और विद्युतीय आवेश भी उत्पन्न होने लगता है।

तत्व रुपी सदाशिव तो एक विलक्षण प्रकार का सबसे सूक्ष्म, सबसे विरल, परम तेजोमय, सर्व चैतन्य तत्व है। इसमें जब यह सर्किट बनता है; तो इसकी भयानकता और इसकी शक्तियों की क्षमता और स्वरुप असीमित होता है। इस रहस्य को जानकार ही आप समझ सकते हैं कि महाकाल क्या है?

महाकाल के अनेक नाम

मार्गभेद से इस उत्पत्ति को अनेक नामों से पुकारा गया है और इनकी शक्तियों को भी। किसी ने इसे आद्या महामाया कहा, किसी ने आद्या भैरवी, वेद में इसे ‘पुरुष’ कहा गया है। गीता में श्री कृष्णा ने अर्जुन को जिस विहाल रूप को दिखाया था, वह यही है। अर्थात यह प्रकृति ही यह सर्किट है और इसके अंदर उत्पन्न होने वाली सभी इकाइयाँ इसी पॉवर-सर्किट में है; एक ही प्रकार के शाश्वत नियमों से उत्पन्न होकर, एक ही संरचना में, एक ही प्रकार के नियमों से क्रिया करते हुए एक ही प्रकार के नियमों से नष्ट हो जाते है। इसलिए हम सब इस प्रकृति की सभी इकाइयाँ इस महाकाल की ही प्रतिकृति हैं। अब आप समझ गए होंगे कि महाकाल क्या है.

शिवलिंग का रहस्य

महाकाल के भक्त इसे एक विशाल शिवलिंग मानते है यानी यह प्रकृति एक विशाल शिवलिंग है और हम सभी इसकी प्रतिलिपि हैं। हम अपना अध्ययन करके इस महाकाल की समस्त शक्तियों का ज्ञान कर सकते हैं। यह महाकाल एक अदभुत रोमांचक और आश्चर्यजनक उत्पत्ति है और चूँकि सभी शक्तियाँ, देवता-असुर-देवी से लेकर समस्त लोक-परलोक, जीव-जंतु इसी में स्थित है; इसलिए ये सर्वेश्वर है। ये सभी की पालना करने वाले, सभी की उत्पत्ति करनेवाले, सभी का विनाश करनेवाले सदाशिव से उत्पन्न महासर्वेश्वर हैं।

इनकी उत्पत्ति योनि रूपा आद्या महाकाली से होती है; और इनके अंदर जो शक्ति धाराएं चलती है; उन्हें ‘महाकाली’ कहा जाता है। इन उत्पत्तियों और शक्तियों का क्रम सापेक्ष होता है। ‘काल’ का अस्तित्त्व इनमें है, इससे है और वह इनमें ही संचरण करता है।

विशेष –

अलग-अलग गुरुओं एवं मार्गों में मतभेद होते है। सब कुछ एक रहते हुए भी कई बातों में मनांतर होता है। हमारा उद्देश्य सिर्फ ‘महाकाल’ को वैज्ञानिकता और उनके साधनाओं के वैज्ञानिक रूप को बताना है। किसी भी विचारधारा या मान्यताओं  को अमान्य करना नहीं।

धर्मालय के प्रसार में सहयोग करें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *