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क्या स्वर्ग नर्क होते हैं?

मौत के बाद की भी क्या ज़िन्दगी होती है? कैसी होती है मरने के बाद की दुनिया? और कहाँ जाता है इंसान मरने के बाद? क्या स्वर्ग और नर्क सच में कोई लोक हैं. क्या मरने के बाद हम स्वर्ग या चले जाते है.

मरने के बाद क्या होता है?

इस प्रश्न का उत्तर हम पहले दे चुके हैं. आपको इसके लिए जीव का विज्ञान समझना होगा. जिसे हम आत्मा कहते है, वह एक नन्हा परमाणु है. हमारी गणना के अनुसार प्रकाश कण से 108 (पॉवर 81) गुणा सूक्ष्म इसका भी आंतरिक पॉवर स्ट्रक्चर है. इसमें सारी संरचना शरीर जैसी होती हैं और 9 मुख्य 99 सह ऊर्जा उत्पादन बिंदु होते हैं. हमारे शरीर की ऊर्जा संरचना भी समान होती है. सभी की प्रकृति में दूसरी संरचना बनती ही नहीं है.

जब +, – धारा या न्यूक्लियर कणों के फ्यूज़न से किसी शरीर का निर्माण होता है, तो एक निश्चित प्रक्रिया से आत्मा नामक यह परमाणु उस शरीर के केंद्र यानी सूर्य या आधुनिक भाषा में नाभिक के केंद्र में चला जाता है और शरीर के ऊर्जा बिन्दुओं के अनुसार इसके भी ऊर्जा बिंदु ट्यून हो जाते है. इस आत्मा के सेट होने पर ही शरीर का अपना फंक्शन स्वचालित होता है. क्योंकि मूल तत्व यानी परमात्म तत्व को खींचने और प्रसारित करने की शक्ति केवल इसमें हैं.

सारे शरीर के ऊर्जा बिंदु ‘भाव’ के अनुसार अपना ऊर्जा-उत्पादन करते हैं. उनका समीकरण भाव के अनुरूप बनता है और चूँकि भाव स्थिर नहीं होते, यह समीकरण भी बदलता रहता है. ‘आत्मा’ के बिन्दुओं का समीकरण भी शरीर के ऊर्जा बिन्दुओं के समीकरण में ट्यून होता रहता है, वे अधिक गहराई से ट्यून करते हैं और अन्य समीकरण आने पर भी ये ट्यूनिंग बने रहते हैं.

आत्मा क्या है?

जब शरीर नष्ट होता है, ‘आत्मा’ नष्ट नहीं होती. इसकी आयु ब्रह्माण्ड की आयु तक की होती हैं. यह शरीर से तो मुक्त हो जाती है, पर इसका ट्यूनिंग समीकरण सना रहता है और उसी समीकरण में इसमें सूक्ष्म आवेश बनते रहते है, जिसका नेगेटिव ढांचा यानी शरीर नहीं होता और असमर्थ होता है.

यह आत्मा ही जीव है . चेतना, संवेदना, अनुभूति इसके गुण है. शरीर होने पर यह शरीर के अनुसार अनुभूत करती हैं, पर जब शरीर नहीं होता, तो इसकी अनुभूतियों का दायरा विशाल होता है. यह अपने समीकरण के अनुसार नेगेटिव शरीर और नेगेटिव वातावरण ढूंढती है. यह प्रकृति का नियम है. जीवों में हम इसे प्रतिदिन देखते हैं. हर जीव का नर अपनी नस्ल की मादा ढूंढता है. इस प्रकृति में ऊर्जा के असंख्य सूक्ष्म स्तर है और असंख्य समीकरण हैं. हर के पॉजिटिव नेगेटिव के लिए पागल है. आत्मा भी व्याकुल होती है और अपने समीकरण का नेगेटिव शरीर ढूंढ कर उसमें समा जाती है और तब वह उसमें ट्यून होकर उस शरीर के अनुसार निर्धारित कर्म को भोगती हैं. यही पुनर्जन्म का सूत्र है और भावकर्म के अनुसार अगले जीवन का भी.

और पुनर्जन्म?

पर जो पुनर्जन्म अख़बारों, पत्रिकाओं, मीडिया का विषय रहा है, जिसमें पिछले जन्म की यादें रहती हैं, वह रेयर घटना है, जब मृत का सूक्ष्म शरीर नष्ट नहीं होता और वह किसी नवनिर्मित शरीर में समा जाता है. सब कुछ ऊपर जैसा ही होता है, पर वह उस शरीर की ऊर्जा संरचना में भी अपनी ऊर्जा संरचना व्याप्त कर लेता है. ऐसे जन्म में पिछली जीवन कुछ दिनों, महीनों, वर्षों तक यद् रहता है, पर धीरे – धीरे वे यादें नष्ट हो जाती है.

स्वर्ग-नर्क, जन्नत का कोई अस्तित्त्व नहीं है. यह मनुष्यों को आचरण संहिताओं में बांधने के लिए बनाया गया भय हैं; पर प्रकृति के अन्य जीवों को नहीं, पर मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है.

जिसका अस्तित्त्व नहीं, वह भोगना पड़ता है?

हाँ, यही सत्य है. यह प्रकृति महा मायाविनी जादूगरनी है. जिस जगत को आप भोग रहे हैं, उसका भी कोई अस्तित्त्व नहीं है. 1000 गुणा बड़ा करनवाले माइक्रोस्कोप दोनों आँखों पर चढ़ा कर देखिये. जो नजर आएगा, वह भयभीत कर देगा.

होता यह है कि जो जिस संसार में पिछला जीवन व्यतीत करता है, उसी संस्कार में अपराधबोध या सुकर्म का विश्वास उसे होता है और जब वह शरीर से मुक्त होता है, तो जो उसका विश्वास होता है, वह उसी दृश्य में होता है. यमराज, धर्मराज, पाप, पुण्य, कर्मों का दंड, नरक-स्वर्ग उसके विश्वास का जगत होता है. वह उसे वास्तविक लगता है, क्योंकि यह एक आंतरिक अनुभूतियों में विचरण करने की अवस्था होती है.

वह स्वयं ही अभियुक्त होता है, स्वयं ही जज होता है, वही धर्मराज होता है, दंड भी वही देता है और भोगता भी वही हैं. अपना ही स्वर्ग – नर्क निर्मित करके.

यही सच्चाई है. समस्त प्रकार की सिद्धियों में हुआ प्रत्यक्ष भी यही होता है.

प्रश्न यह है कि यह मुझे कैसे पता?

इन प्रश्नों का उत्तर उन सैट सन्यासियों से प्राप्त हुआ, जिनकी चर्चा में पहले कर चुका हूँ.

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