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क्या वैदिक ऋषि मुनि गाय का माँस खाते थे?

प्रश्न – क्या यह सच है? क्या पौराणिक ग्रंथों में इसके विवरण हैं?

उत्तर – हमारा स्वयं का मस्तिष्क ही मानसिक रूप से दिवालिया हो गया है। कौन है , यह रघुवर प्रसाद सिंह? पहले इसके व्यक्तित्व और चरित्र पर ध्यान दीजिये। इसका सनातन धर्म से कुछ लेना-देना है? इसने यत्र-तत्र एक –दो पुस्तकें पढ़ ली और उनके तथ्यों को अपने मतलब के लिए प्रयोग करने लगे। हमारी राजनीति और डेमोक्रेसी नाम का यह तन्त्र पूरी तरह बर्बाद है। हम समाज केछंटे हुए बदमाशों के हाथ में है। एक-दो अपवादों से इस सत्य को काटा नहीं जा सकता। ये लोग केवल समाज को ही तोड़-मरोड़ कर उसका रक्त नहीं चूस रहे; इन लोगों ने एक विचित्र तरह का बौधिक्जागत भी खड़ा कर दिया है। यह काम नेहरु के समय से प्रारंभ हुआ और आज तक चल रहा है। इसका काम भारत की प्राचीन संस्कृति को घटिया साबित करना, उसे पिछड़ा, अत्याचारी और चरित्रहीन साबित करना और रसिया-यूरोप के आदर्शों को स्थापित करके आपनी रोटी सेकना रहा है। ऐसे लोगों की श्रृंखला है। इतिहासकार, पुरातत्वविद , साहित्यकार – जिसने भी ऐसा किया , पुरस्कृत हुए महान बन गये। यहाँ हनुमान जी को आतंकवादी कहने वालों, भगत सिंह जैसे लोगों को अपराधी कहे जाने वालों की पूजा होती रही है। मैं इन लोगों की संगति मैं रहा हूँ और ये कैसे महान बनकर पुरस्कृत होते है; इनकी रग-रग की जानकारी रखता हूँ।

वैदिक युग आधुनिक समय गणना के अनुसार ही 6 हजार वर्ष पुराना कहा जाता रहा है। लोकमान्य तिलक और दयानन्द सरस्वती की गणनाओं को माने तो लाखों वर्ष पुराना। यह जिस विज्ञानं के बारें में बता रहा है; उससे यह लाखों वर्ष की कहानी लगती भी है। क्योंकि इनके द्वारा कही जा रही बाते मानव मस्तिष्क के दायरे से बाहर की है। कोई सभ्यता इतना विकसित विज्ञान पांच-दस हजार वर्ष में प्राप्त नहीं कर सकती।

अब उस युग में क्या होता था , इसको आज के समाज पर थोपने की कोशिश करनेवाला पाखंडी क्यों ऐसा कारने की कोशिश आकर रहा है; इसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए। उस युग में तो लोग सैकड़ों हजारों पत्नियाँ रखते थे, तो क्या ये लोग अब इसे स्थापित करेंगे? वैसे यह सत्य नहीं है कि ऋषि-मुनि गाय खाते थे; परन्तु यह भी सत्य नहीं है कि यज्ञों में पशुओं की बलि नहीं दी जाती थी या सनातन धर्मी बुद्ध और गांधी की अहिंसा को मनाते थे। ऐसे अवैज्ञानिक , अव्यवहारिक तत्वों का सनातन धर्म में कोई स्थान नहीं था। इस तरह वे महान धर्माधिकारी भी गलत है; जो मद-माँस आदि की आध्यात्मिक व्याख्या करने लगते है और यह प्रमाणित करने लगते है कि सनातन धर्मी बौद्ध आदर्शों को मानने वाले थे। किसी बात का प्रिय लगना और व्यवहारिक होना – दो अलग-अलग तथ्य है।

इस बात की पुष्टि प्राचीन कोई भी तथ्य नहीं करता कि सनातन धर्मी एक गाल पर मारों, तो दूसरा गाल आगे करनेवाले और माँस मछली नहीं खानेवाले थे। राम ने रावण को नहीं कहा था कि हमारे भाईयों की पत्नियों को भी ले जाओ, एक दिन तो तुम्हे शर्म आएगी ही? सम्पूर्ण राक्षस समाज का विनाश कर दिया था। श्री कृष्ण गीता अर्जुन को युद्ध करने की प्रेरणा देने के लिए कही गयी है। युद्धों, अस्त्र-शस्त्रों, बलि, मांसाहार के विवरण सम्पूर्ण प्राचीन ग्रंथों में भरे पड़े है। सनातन धर्म के किसी भी मार्ग का कोई देवी-देवता शस्त्रविहीन नहीं है।

पर हमारे समाज में ऐसे महान लोग है; जो गांधी के आदर्शों पर आँसू बहायेंगे और अपने चारों ओर 108 मशीनगन की सुरक्षा लेकर चलेंगे। एक तरफ गांधी का अहिंसावाद टी.वी. के पर्दे अपर होगा, दूसरी ओर मिसाइलों का प्रदर्शन। भाई जब ‘अहिंसा’ इतनी बड़ी महा मिसाइल है; तो यह सब किस लिए? फौजों को फूल थमाओं, पुलिस को सेंट की शीशी दो। एक-तरफ अहिंसा का राग, दूसरी और राम का भजन ? क्या ड्रामा है भाई? राम-कृष्ण तो अहिंसक थे ही नहीं?

अब कुछ बुद्धिजीवी तर्क देने लगे है कि खाने-पीने पर बंदिश नहीं लगाई जा सकती। तो भाई मेरे! सलमान खान पर क्यों केस चला रहे हो? उसे हिरण का माँस ही अच्छा लगता है। कछुआ खाने वालों पर क्यों क़ानून बनाते हो? गाय को संरक्षित करना आज की आवश्यकता है। धर्म की जाने दीजिये। जिस पशु का मल-मूत्र तक गंभीर रोगों की दवा हो; उसको संरक्षित करना आवश्यक नहीं है? वस्तुतः इसमें सरकारें दोषी है। वह पशुओं का संरक्षण यूरोपियन मापदंड पर करती है। देश की आवश्यकता पर नहीं। गाय के साथ-साथ भैंस भी संरक्षित करना चाहिए। हमारे यहाँ दूध की भारी कमी है।

हमारा समाज ऐसे ही घनचक्कर आदर्शों एवं मान्यताओं में उलझा सांस ले रहा है। इसकी कोई दिशा ही नहीं है। शरारती बंदरों की शरारते अलग कभी इधर- कभी उधर छेद कर देती है। यह जहाज चल रहा है , यही चमत्कार है। पर कब तक चलेगा?……. यह कहना मुश्किल है।

वैदिकी हिंसा हिंसा न भवती -http://goo.gl/yl4E1c

One thought on “क्या वैदिक ऋषि मुनि गाय का माँस खाते थे?

  1. mahan satya kaha hai gurudev aapne mujhe garv hai ke aap jaise mahan nidar aur divya buddhiman guru ka mujhe margdarshan prapt ho raha hai. gurudev koti koti pranam.

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