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क्या पुनर्जन्म होता है? इस जन्म के कर्मों से उसका क्या सम्बन्ध है? क्या कर्म ही भाग्य के रूप में फलित होते है? या भाग्य कर्म को निर्धारित करता है?

ये एक साथ कई प्रश्न है। सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए हमें जानना होगा कि ‘जीव’ क्या है? सनातन धर्म के विज्ञान के अनुसार जो वास्तविक ‘जिव’ है; वह ब्रह्माण्ड के नाभिक से निकलने वाला नाभकीय कण है; एक अतिसूक्ष्म परमाणु जिसकी बौछार इससे निरंतर रुक-रुक कर होती रहती है। यह समस्त ब्रह्माण्ड में प्रचुर मात्रा में विकरित होता रहता है।

जहाँ-जहाँ + एवं – धाराएं या + एवं – पिंडों के नाभकीय कण एक-दूसरे से मिलते है, शरीर रुपी ऊर्जा संरचना उत्पन्न होती है। आत्मा (सार) रुपी परमाणु इस शरीर में इसके शीर्ष से होकर इसकी पम्पिंग से खिंचकर इसके केंद्र में चला जाता है और उसके सभी पॉवर-पॉइंट इस शरीर के अनुसार ट्यून हो जाते है। इससे शरीर में भी वे पॉवर-पॉइंट उत्पन्न हो जाते है। इस ट्यूनिंग के कारण इसमें आवेश उत्पन्न होने लगता है, जो ट्यूनिंग के समीकरण में होता है। इससे उसका भाव, रूप – आकृति, कर्म उत्पन्न होता है। यहाँ भाग्य निर्धारित करता है कि किसे कैसा कहाँ शरीर मिलेगा।

चेतना इस परमाणु का गुण है, जो शरीर में मल्टीप्लाई होकर उस ऊर्जात्मक व्यवस्था के अनुरूप व्यक्त होता है। इस प्रकार जो इकाई उत्पन्न होती है; वह इस आत्मा को अपने शरीर के बंधन में बाँध लेती है। उसके पास कर्म करने की स्वतंत्रता होती है, पर ज्यादा स्पेस नहीं होता। यदि बाघ बना है, तो शरीर के धर्म के ही अनुरूप कर्म की           स्वतंत्रता होगी, वह पक्षी के कर्म नहीं कर सकता। पर शरीर के बंधन के बाद भी यदि वह चाहे, जो अपनी अज्ञानता के कारण वह नहीं चाहता और उस शरीर के अनुभूति के संसार में बंध जाता है; तो चाहने पर वह अभ्यास करके कुछ भी कर सकता है। निरंतर अभ्यास और मानसिक केंद्रीय करण से वह पंखवाला भी बन सकता है; पर इसके लिए उसे अपने शारीरक अनुभूतियों से मुक्त होकर अभ्यास करना होगा।

शरीर के ऊर्जा समीकरण की ट्यूनिंग ‘भाव’ के अनुसार होती है। भाव ही कर्म को परिभाषित करता है। इस ट्यूनिंग के अनुसार आत्मा के पॉवर-पॉइंटो की भी ट्यूनिंग होती रहती है। मृत्यु के समय वह जिस समीकरण में ट्यून होता है, वही रह जाता है और उससे उसी समीकरण का चार्ज उत्पन्न होकर उसे आवेशित करता है। चार्ज है, तो कामना है और कामना है, तो वह उसी ऊर्जाक्षेत्र में जाएगा, जैसा चार्ज उस पर है; क्योंकि उसे नेगेटिव की तलाश होती है। उस समीकरण का शरीर मिलते ही वह उसमें खिंच जाएगा और उस शरीर को धारण करेगा।

जन्म-जन्म के फेरे का वैज्ञानिक स्वरुप यह है। या आत्मा ब्रह्माण्ड के जीवनकाल तक नष्ट नहीं होती। यह बार-बार शरीर धारण करके जन्म-जीवन और मृत्यु का दुःख भोगती है। यही इसकी नियति है; क्योंकि यह कभी न्यूट्रल नहीं हो पाती। इसीलिए हमारे ऋषियों ने वैराग्य की महत्ता पर जोर दिया है। इसी लिए कृष्ण कहते है कि कर्म के प्रति राग मत रखो। राग नहीं है, तो ट्यूनिंग भी नहीं होगी, चाहे आप कुछ भी कर रहे हों। श्री कृष्ण के अनुसार यही वास्तविक सन्यास या मुक्ति का मार्ग है। कर्म का त्याग नहीं हो सकता, भाव का भी त्याग नहीं हो सकता; पर राग का त्याग हो सकता है।

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