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क्या किसी माला की सिद्धि मंत्र जपने से होती है?

भारी भ्रम है यह। जब भी हम इसकी शास्त्रीय विधियों को देखेंगे, उनकी प्रकिया होती है। मन्त्र जप साथ चलता है, पर उस प्रक्रिया में जो कुछ होता है, उस पर किसी का ध्यान नहीं होता। मंत्र की शक्ति तो होती ही हैं, पर यहाँ विधि प्रकिया का महत्त्व अधिक है , क्योंकि माला , तन्त्र के टेक्निक पर आधारित वस्तु है। इसमें तकनीकी की महत्ता है।

आजकल माला का मटेरियल भी पूर्णतः विश्वास के योग्य नहीं होता। बहुत सी बातें में तो चाहे जितना रुपया खर्च कर लीजिये, पर गारंटी कोई नहीं होती। एक से एक कलाकार भरे पड़े हैं सामान्यतया लोग बाजार पर निर्भर करते हैं।

तब क्या जप व्यर्थ जाएगा?

यदि इसके सूत्र को जानेंगे , तो नहीं जाएगा। आप देखेंगे कि भिन्न वस्तुओं की माला का कहाँ-कहाँ किस देवी –देवता में प्रयोग होगा, इसका वर्गीकरण है। स्पष्ट रूप से समझा जाता है कि उस वस्तु में कोई गुण है, जिससे वह वहाँ प्रयुक्त होता है। जैसे स्फटिक की माला को लीजिये। इसमें ऊर्जा प्रवाह का केन्द्रीयकरण होता है। वहाँ से वह साधक के शरीर में गमन करता है। माला के दानों को बल्ब या सूरज की ओर कीजिये, यदि वह केंद्र में प्रकाशित है; तो वह काम करेगा। …. आपको करना केवल यह है को विधिवत् उसका ग्रन्थन करें। ग्रन्थन का सूत्र यह है कि दोनों के बीच में एक छोटी गाँठ होनी चाहिए, ताकि दाने एक –दूसरे से थोडा अलग रहे। इस गाँठ की भी विधियां है, पर यहाँ कारण देखना चाहिए। कारण केवल यह है कि दोनों का ऊर्जाक्षेत्र अलग रहे और इतना अलग भी न हो कि दोनों का सम्पर्क न रहे। बिजली की प्रकृति से समझिये। + एवं – पोल सटे हो, तो उनमें एक ही प्रवाह होता है , पर जरा सा अलग हों, तो वहाँ स्फुलिंग होने लगती है, ज्योति निकलती है।माला के दानों में भी जब हमारा ऊर्जा-प्रवाह होता है , यो वह नेगेटिव ऊर्जा से चार्ज हो जाता है और उसमें चारों ओर से उसी समीकरण का + बनाकर उसमें आने लगता है। हमारे शरीर में यह + समायोजित होता है। इसका लाभ मिलता है।

रुद्राक्ष कैसी भी हो , उसे पहले हल्दी घुले पानी में डालकर उसमें शुद्ध ताम्बा और लोहा को गर्म कर करके 108-108 बार बुझायें, फिर 12 घंटे छोड़ दें। इसके बाद निकालकर हवा में सुखाएं और शुद्ध घी या सरसों तेल में डालकर 24 घंटे छोड़ दें। फिर उसे पोंछ कर माला बनाकर पूजा-पाठ या मंत्र सिद्ध करें।

आजकल हल्दी की जो भी माला मिलती है, वह हल्दी की गांठों को छीलकर नहीं बनाई जाती। उसके बुरादों को गोंद में जमाकर बनाई जाती है। इसमें परेशानी यह होती है कि सिद्धि-प्रक्रिया में 100 में से 50 दाने खराब हो जाते है। सिद्ध करना है, तो इन्हें भिन्न-भिन्न द्रवों से अभिषेक करना ही होगा।

शास्त्रों में बहुत सी माला के वर्णन है; उनमें बहुत सी दुर्लभ वस्तुओं की है, बहुत सी सामान्य वनस्पतियों , खनिजों आदि की जो चमत्कारिक फल देती है; परन्तु इन्हें बनाना कठिन है। मशीन लगायेंगे तो हजारों माला का स्कोप होना चाहिए और इन विशिष्ट मालाओं का इतना डिमांड नहीं होता। हाथ से कठिन परिश्रम से मनके तो बन जाते है; पर इनमें छेद करना समस्या है। इसलिए ज्ञात रहते हुए और मटेरियल उपलब्ध रहते हुए भी इनकी माला बनना एक दुष्कर कार्य है। कुछ चीजों पर हमारा प्रयोग जारी है। सफलता मिलने पर वेबसाइट पर यह उपलब्ध होगा।

Email – info@dharmalay.com

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