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कैसे काम करते है यंत्र और ताबीज

इसको समझने के लिए हमें इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों को देखना होगा। अभी के सर्किटों की बात हम बाद में करेंगे। पूर्व के युग में जो रेडियो-ट्रांजिस्टर बनते थे; उसके कुछ पार्टों पर नजर डालें।आइ. एफ. में क्या होता था? एक तार का निश्चित लपेटा और उसके मध्य में कार्बन कैप, जिसे एडजस्ट किया जाता था।मीडियम एवं शोर्ट वेब के कॉइलों में भी यही होता था। कंडेंसर में सिगरेट की पन्नी जैसा कागज़ का लपेटा होता था और रेजिस्टेंस का मतलब सब जानते है सब जानते है। ‘अवरोधक’ इसके अंदर भी एक तार ही होता था।

पर इसमें वातावरण से तरंगों को अवशोषित करने की ताकत आ जाती थी। साधारण वस्तुओं का तकनीकी उपयोग, जो वातावरण से ऊर्जा प्राप्त कर सके। यही तकनीकी यंत्रों एवं ताबीजों की होती है। जो रेखाएं आपको साधारण लगती है, वे विशेष पैटर्न के कारण महत्तवपूर्ण हो जाती है। ताबीजों में भी यही होता है।

अब प्रश्न उठता है कि प्राचीनकालीन सूत्रों में यंत्र लिखने और बनाने की जो विधियाँ लिखी गयी है, क्या वे इस युग में संभव है? गोरोचन जैसे अनेक पदार्थ दुर्लभ हैं और कलम भी अब बनाना संभव नहीं; क्योंकि कहीं कौवे का पंख प्रयुक्त होता था, तो कहीं सहदेई की डंडी। बहुत सी वस्तुओं की पहचान लुप्त हो गयी है, तो बहुत से दुर्लभ है।

यह बिल्कुल सत्य है। पर आप यह बताईये कि क्या इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों में वैज्ञानिक उसी प्राचीनता को पकडें बैठे है; जो ‘वाल्व-रेडियो’ के युग में था? कंप्यूटर कमरे इतने बड़े हुआ करते थे और आपने भी देखा है कि टी.वी और कैमरे की तकनीकियों में कैसे-कैसे परिवर्त्तन होते रहे है और आज हम कहाँ है। अब तो पोलीथिन शीट जैसे टी.वी. की बात हो रही है, जिसे मोड़ो, जेब में रखो और जहाँ मन आये प्रयुक्त करो।

हमारी मुसीबत यह है कि हम सनातन धर्म के विज्ञान को नहीं समझ रहे, हम समझते है कि यंत्रों में जादू-टोना होता है कि पहनों चमत्कार होने लगेगा। वस्तुतः जो प्रयोग तन्त्र में अभिचार कर्मों के होते है, जिन्हें हम जादू-टोना कहते है; उनमें भी वैज्ञानिक वर्गीकरण है और तकनीकीयाँ उनके अनुसार है।समय. तिथि, हवन कुण्ड, समिधा, हवन सामग्री, विधि, माला, दीप, दिशा आदि के वर्गीकरण में हजारों प्रभेद है। मन्त्रों तक के प्रयोग की विधियों में तकनीकी प्रभेद है। अब यदि आप बाजार में बैठे 24 घंटे में तकदीर बदलने और हर कामना की पूर्ती कराने वाले पर विश्वास करते है; तो यह आपकी मुर्खता है, इसमें शास्त्र के वैज्ञानिक सूत्रों का क्या दोष?

यंत्रों एवं ताबीजों के निर्माण में भी प्राचीनता को पकडें रहने का कोई तुक नहीं है। जड़ता और अंधी आस्था कभी वैज्ञानिक होती ही नहीं है। गोरोचन नहीं मिलता, कोई बात नहीं। गाय के गोबर के रस में पानी मिलाकर रंग प्रयुक्त कीजिये। यहाँ पैटर्न और रंग का महत्त्व है और गाय की ऊर्जा के समीकरण का।

सनातन सूत्र है कि एक ढाँचा बनाओ। उसमें विद्युत प्रवाहित होने लगेगा; भले ही वह प्रकाश से कई गुणा सूक्ष्म हो (यह लाखों गुणा भी हो सकता है) जैसे ही ऐसा होगा, उसके विपरीत पॉजिटिव बनने लगेगा और उस ढाँचे में समाहित होने लगेगा। क्योंकि वह उसी के ऊर्जा-समीकरण की पॉजिटिव उत्पत्ति है। समस्त मन्दिर इसी सूत्र पर निर्मित है। वस्तुतः यह ‘तन्त्र’ का सूत्र है , जो सनातन धर्म का वैज्ञानिक क्षेत्र है। यहाँ कंडक्टर-नॉन कंडक्टर का कोई फर्क नहीं है। धातु-अधातु की बातें सापेक्ष है और वह उस बिजली से सम्बन्धित है , जिसे हम प्रयोग करते है। यंत्रों के पैटर्न पर जो विद्युतीय धारा बनती है; वह एक परमानेंट रिसीवर बनकर एक विशेष प्रकार की ऊर्जा घर एवं शरीर में फैलाने लगती है। ज्योतिषीय रत्नधारण विज्ञान भी इसी सूत्र पर है।

अब आप सोच रहे होंगे कि सनातन सूत्र का मतलब स्थायी और सार्वभौम सूत्र है, तो आधुनिक बिजली भी इसी सूत्र बनाई जा सकती है?….. जी हाँ; निश्चित बनाई जा सकती है, क्योंकि आकाशीय बिजली भी इसी सूत्र पर बनती है और सूखे चक्रवातों के मध्य बनने वाली बिजली भी इसी सूत्र पर बनती है।हमारे अंदर भी इसी सूत्र पर ऊर्जा का उत्पादन होता है और पेड़-पौधे में भी जीवन ऊर्जा इसी सूत्र की देन है। यह सूत्र कहाँ-कहाँ लागू है; इसकी जानकारी मॉडर्न साइंस को हो, तो उसके हक्के छूट जाएँ। उसकी अनेक धारणाये बदल जाए; पर कोई अहंकारी सत्य को नहीं स्वीकारता। क्या हिरणकश्यप ने स्वीकारा था?

 

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