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कैसे काम करता है हमारा उजाॆ चक्र ?

सिद्धि साधनाओं के लिये जानना जरूरी है कि सामान्य जीवन में हमारा उजाॆ चक्र कैसे काम करता है .? सिद्धियों के लिये कोई अलग से क्रियात्मकता नहीं होती .

अनाहत ,जिससे हमारा हृदय विकसित होता है ,हमारे शरीर का सूयॆ है .इसे जीवात्मा भी कहा जाता है .आत्मा इसके केन्द्र में रहती है .इससे सारे चक्र मल्टीफेज तरंगों से जुड़े होते हैं ,जो प्रकाश से कई स्तर सूक्छम होते है .

इसका पहला जुड़ाओ विशुद्धचक्र से होता है .यह चक्र उन तरंगों को अपने तरंग में बदल कर सहस्त्रार चक्र मे पहुचा देता है .सहस्त्रार फिर उसे अपने तरंगों में बदल कर आग्या चक्र में पहुँचा देता है .आग्याचक्र उसके अनुसार बाहर भीतर की क्रिया का संचालन करता है .कंट्रोल अनाहत के मध्य में बैठे आत्मा का होता है .यही वास्तविक जीव है . यही क्रम उल्टे भी चलता है .

आग्याचक्र की तरंग दूर दूर तक बाहर गमन करती हैं .इन्हीं से आँख कान नाक विकसित होते हैं ,पर इसका स्वतंत्र स्वरूप भी होता है .बाहरी दृश्यों यानी वस्तुओं से टकरा कर यह तरंगों का पैटने चेंज करते वह सिग्नल मस्तिष्क यानी सहस्त्रार मे भेजता है .वह स्मृति कोष से विश्लेषित करके ,उसे विशुद्धचक्र को भेजता है .,वह अपने स्वरूप मे बदल कर अनाहत को भेजता है ,पर अनाहत सभी में रूचि नहीं लेता .जिसमें रूुचि होती है ,उसमे अपनी इच्छा फिर तरंगों के द्वारा विशुद्धचक्र को भेज देता है .वह मस्तिष्क मे और उसके लिये क्या करना है ,यह म‌स्तिष्क आग्याचक्र को प्रेषित करता है ,फिर आग्या चक्र की तरंगे उसका क्रियान्वन करतीं हैं .

यहाँ विशुद्धचक्र जो भाव का चक्र भी कहा जाता है ‌जीव का स्टीयरिंग ह्वील का काम करता है और उसी से मस्तिष्क कन्ट्रोल होता है .,उसी के अनुसार आग्याचक्र की तरंगें नाचतीं है, जिन्हे गणेश जी का ‌सूँढ़ कहा जाता है .गणेश को क्यों शिव-पावॆती का पुत्र कहा जाता है ,यह यहाँ स्पष्ट है .सहस्त्रार में शिव पावेती का निवास होता है .

जो हम कामना करेंगे वही क्रिया होगी ,क्योंकि वही हमारा भाव होगा .यह जितना प्रबल ,जितना गहरा होगा क्रिया भी उतनी गम्भीर होगी .भाव निरंतर अभ्यास से प्रबल और गहरा होता है और इसी का नाम तपस्या या साधना है .

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