किये कराए में मंत्र और हवन का प्रयोग

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पृथ्वी पर लाखों तरह कि वनस्पतियाँ और जीव पाए जाते है। बहुतों के बारे में तो हमें ज्ञात ही नहीं है। इसमें अजीबों गरीब गुण पाए जाते है। अंगूठे के नखों पर लगाओं, पेट चलने लगेगा; घर में जलाओं मच्छर छिपकली भाग जायेंगे, हाथ में रस लगा, फोफले हो जाएंगे, इसका धुँआ सांस से अंदर गया; मर जायेंगे, शरीर से घर्षण हुआ खुजली शुरू हो जायेगी, आदि-आदि।

जब ऐसी चींजे चलती है, तो इनसे निकलने वाली आग, ऊर्जा, धुँआ, राख तक में यही गुण होते है और अधिक तीव्र प्रतिक्रिया करते है।

ऐसे खनिज एवं वनस्पति विष भी है। इनको आपके शरीर के किसी अवशेष के साथ कूटकर मन्त्र शक्ति का प्रयोग करते हुए धीरे-धीरे हवन किया जाए और यह हवन क्रिया 9 दिन जारी रखा जाये(एक बार में समय लेकर लक्षण प्रकट होते है); तो वह व्यक्ति उस ऊर्जा को शोषित करेगा; चाहे वह पृथ्वी पर कहीं ही। उसमें अप्रत्याशित विकार उभरने लगेंगे।

यह केवल विध्वंसक नहीं है। शान्ति कर्मों में भी इसी तकनीकी का प्रयोग किया जाता है। वशीकरण आदि में भी।पहले बताया गया प्रयोग भी सभी वशीकरण आदि में प्रयुक्त होता है। यदि आपको मन्त्र सिद्ध नहीं( ये एक  ही काम के सैकड़ों है) या आपने कोई सिद्धि नहीं कर रखी है; तो आपको प्रतिदिन में बांटकर 21000 मन्त्र से एकाग्र होकर आहुति देनी होगी। प्राचीन काल में यह संख्या 10, 000 थी। अब वातावरण में अवरोध बहुत है। हमारे उपकरणों से भी इस प्रकार के माइक्रोवेब्स उत्पन्न हो रहे है। मोबाइल फोन, टीवी, इन्टरनेट आदि में भी इसी स्तर की ऊर्जा-तरंगों का जाल है।

इस हवन का धुआँ नाक में जाए, तो जो यह प्रयोग करता है, वह भी प्रभावित हो जायेगा; क्योंकि ऊर्जा तरंग तो अवशोषित नहीं होगी, क्योंकि वह अपने नेगेटिव को तलाशेगी; लेकिन धुंआ को आप रोक नहीं सकते। इसके लिए सुरक्षा के विशेष ऊपाय किये जाते है।

ऐसे हवन में अवशिष्ट भभूत-भस्म भी इन्ही गुणों से युक्त होते है; पर इनको 9 दिन युक्ति से खिलाना पड़ता है। अक्सर पानी में घोल-छान कर इसका प्रयोग गुप्त रूप से किया जाता है। प्रत्यक्ष में तो खिलाया ही जाता है, पर मलाई आदि में डालकर। जड़ी-बूटियों से तैयार इस तरह का हवन-भस्म अनेक रोग-शोक –चिंता से मुक्ति दिला देता है। अनेक विध्वंस भी करता है।

आश्चर्य यह है कि परिक्षण, केमिकल एनालिसिस, उसके गुणों का वर्णन यत्र-तत्र दबे हुए विवरणों में मिल जाता है; पर स्वतंत्रता के बाद इन्हें बकवास मानकर छोड़ दिया गया।

डिस्कवरी पर ऐसे मामले आते रहते है कि कौन सी वनस्पति खाने योग्य है, किसमें जहर होता है। यह जंगल-शो दिखने वाले बताते रहते है। इसमें कैक्टस के बारे में एक दिन बताया जा रहा था। इसकी एक विशेष प्रजाति की सुखी लकड़ी से कुछ ने खाना बनाया; कुछ लोग जो वहां नहीं थे, इससे पके भोजन को खाया, सभी के सभी मर गये। इसमें से दो व्यक्ति ने बताया कि  क्या हुआ था; पर वे भी नहीं बचे।

एक कहानी मिथिला में प्रसिद्द थी। एक बार चरक से उनके शिष्य ने पूछा –“इमली-नीम, दोनों वृक्ष है; पर इनके गुणों में क्या सचमुच कोई विशेष प्रभाव है?”

उन्होंने कहा –“इस बार तीर्थ यात्रा के समय तुम जाते समय इमली के वृक्ष के नीचे ही ठहरोगे , उसी की लकड़ी से खाना बनाओगे, उसी का दातौन करोगे। आते समय नीम के वृक्ष के नीचे ठहरोगे और उसी की लकड़ी से खाना बनाओगे, उसी के दातौन से मुंह धोओगे।”

शिष्य ने इसका पालन किया। जब वह तीर्थ में पहुंचा, तो चमड़े फट गये थे, घाव रिस रहा था, वमन, डीएसटी, जलन का शिकार था; पर जब वह लौटा, तो आश्रम में पहुंचते पहुँचते वह पूर्णतया निरोग था।

यहाँ केवल इमली-नीम के गुणों का ज्ञान नहीं होता। यह भी ज्ञात होता है कि वनस्पितयों की श्वांसों, उसकी लकड़ी, उसका रस- सभी प्रभाव डालते है। हवन का विज्ञान इस पर आधारित है। कल तक बांस की जड़े उत्तर-बिहार के घर घर में मवेशियों के घर में जलती थी।बांस का आयुर्वेदिक गुण देखिये। कीटनाशक, मच्छर नाशक, पत्तों से जूँ-लीक-नष्ट होना –पेट के कीड़े नष्ट होना, राख से सिर के गंजे में लाभ।इसका धुआं जानवरों के शरीर पर बैठने वाले अन्य जीवाणुओं को भी मार या भगा देता था।

छिपकिलियाँ घर में बढ़ गया हैं। मोर पंख लटकाईए , इसी का धुप दिखाईये, एक भी नजर नहीं आएँगी।स्वाभाविक है कि अन्य विनाशक जीवाणु भी नष्ट होते होंगे।

विज्ञान केवल वही नहीं, जिससे यन्त्र बनते है।कुछ और भी है, जहाँ में एक मुट्ठी मिट्टी के बाद!

 

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