आप यहाँ हैं
धर्मालय > डिस्कवरी ऑफ़ भैरवी चक्र > कामभाव में कैसा आध्यात्म हो सकता है?

कामभाव में कैसा आध्यात्म हो सकता है?

आदिकाल से सारे ऋषि मुनि भौतिकता को नष्ट करके स्व की चेतना के बोध को समाप्त करने के लिए कठोर तप करते रहे है। इस स्व बोध से रिक्त होने के बाद ही ईष्ट में विलुप्ति होती है। प्रत्येक मन्त्र या भाव की सिद्धि इसी अवस्था में होती है। भौतिक रूप से मंत्र जपने या पूजा-पाठ हवन करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। इसे ही अघोर-तंत्र में ‘शमशान साधना’ कहा जाता है।

उर्ध्व नाम्नाय में शैवाचार्यों ने कहा है कि यह स्व बोध रिक्ति कामभाव में सरलता से हो जाती है; आवश्यकता उसे स्थायी बनाने की होती है। किसी सिद्धि के लिए भी इस अवस्था का प्रयोग सिद्धि को सरल कर देता है।

पर यह मार्ग आसान नहीं है। काम-रुपी भैंसे की रफ्तार पर सवार स्त्री-पुरुष का विवेक से नाता टूट जाता है। इसे कुछ विशेष तकनीकी (विधि) और कठिन अभ्यास से नियंत्रित किया जाता है। यह एक गोपनीय क्षेत्र है, बिना ‘दीक्षा’ (शपथ एवं भूत शुद्धि) के इसे प्रकाशित करने का वर्जना है।

उर्ध्व नाम्नाय की काम क्रीडा सामान्य नहीं होती। हम जानवरों की तरह सेक्स करते है; पर यह स्त्री को देवी रूप मानकर पूजा के योग्य का भाव रखता है। स्त्री भी पुरुष को शिव समझकर पूजन करती है। मानसिक भाव सम्पूर्ण अभिन्नता और अस्तित्त्व विलय का होता है। सिद्धि और आध्यात्म की बात छोड़ भी दें, तो भी इस प्रकार की क्रीड शारीरिक, मानसिक, ऊर्जात्मकता, आयु, सौन्दर्य सबकी वृद्धि करने वाला और वास्तविक परम सुख को अनुभूत कराती है।

सामान्य कामभाव के विश्लेषण करने से यह बात समझ में नहीं आएगी।

One thought on “कामभाव में कैसा आध्यात्म हो सकता है?

Leave a Reply

Top