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आपको ख़तरा किससे है?

संभवतः यह प्रश्न आपने कॉपीराइट सम्बन्धी वैधानिक चेतावनी पर किया है। तो खतरा हो या न हो यह मेरा वैधानिक अधिकार है। मेरी समस्त पुस्तकों पर भी यह चेतावनी होती है। मेरठ में इसी सब्जेक्ट पर ऐसा ही एक मामला फंसा था और पांच अरबपति पब्लिशर इसके चपेट में आ गये थे। मायावती की सरकार थी और बीजेपी सहयोगी थी। उन लोगों ने पब्लिक खरीद ली (डॉक्यूमेंट्री प्रूफ है); व्यापार संघ उनके समर्थन में उतर आया। एक स्थानीय बी.जे.पी. मिनिस्टर उनकी पैरवी करने लगा , जो आज बहुत ऊंचे कद का नेता है। क्योंकि उनका नगर अध्यक्ष भी केस के चपेटे में था।पर कुछ नहीं चल पा रहा था। मैं आराम से घर पर था और वे गिरफ्तारी से बचने के लिए भाग रहे थे। वे हाई कोर्ट गये; पर वहां उल्टा पर पर गया । जमानत तो महीने बहर का मिल गया; पर चीफ सेक्रेटरी से के महीने में इसे निपटाने और रिपोर्ट करने के लिए कहा गया। डॉक्यूमेंट्री प्रूफ थे, जो ऐसे मामले में होते ही है। निपटाने का अर्थ जेल जाना था। इसमें धारा 467 भा.द.वि. भी लगा हुआ था यानी १५ वर्ष जमानत तक संभव न थी। तत्कालीन आ.ई.जी मेरठ पर भारी राजनीतिक दबाब था; पर पुलिस वालों की अपनी गर्दन फंस रही थी। बौद्धिक सम्पदा का मामला यू. एन. ए. के वर्ल्ड ऑर्गेनाइजेशन से जुड़ा होता है। अटल जी प्रधामंत्री थे। केन्द्रीय सरकार को भी पत्र लिखा गया था, वह भी राज्य सरकार के माध्यम से वहां पहुच गया। नगर अध्यक्ष को बर्खास्त कर दिया गया। आई.जी ने एस.एस.पी से एक हफ्ते में मामले को निपटाने के लिए कहा और तब वे सब प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री वेद प्रकाश शर्मा के पास पहुच गये। वे मेरे मित्र है। उन्होंने फोन किया कि प्रेम जी! ये बुरी तरह टूट हुए है। अब आप ही इन्हें जेल जाने से बचा सकते है। आज इनकी समझ में आ गया कि कुछ छापने पर भी आजीवन कारवास हो सकती है।

श्री वेद प्रकाश शर्मा की मध्यस्थता में लाखों रुपया जुर्माना भरकर उन लोगों ने माफ़ीनाम लिया। और बचने के लिए जो डॉक्यूमेंट बनाये मुझ से साईन करवाकर अपना साइन किया , वह मेरे F.I.R के एक एक शब्द का प्रमाण बन था। समझौता हो गया। पुलिस ने जो लिखा, वह पुलिस की गर्दन फंसा गयी। आज में सुप्रीम कोर्ट पहुच जाऊ , तो सारी की सारी पुलिस प्रणाली ही प्रश्नों के घेरों में आ जायेगी और बुढापे में कईयों को जेल भी जाना पड़ेगा। मैंने अपने मित्र के समझौते का सम्मान किया। वे आज भी है और राष्ट्र के एक प्रसिद्ध व्यक्ति है। उनके उपन्यासों पर कई फिल्में भी बन चुकी है। मैं ऐसे मामले भुगत चुका हूँ। इसलिए यह चेतावनी देना आवशयक हो गया।

रह गयी खतरे की बात तो इसे जानने –समझने, व्यक्तिगत तौर पर इसका अध्ययन करने, इसे उद्धृत करने या शिक्षा के उद्देश्य से प्रसारित करने पर कोई रोक नहीं है; यदि इसके मौलिक स्रोत का उल्लेख करते हुए कहीं किया जाता है। कोई चीज प्रकाशित ही इसलिए की जाती है। कानूनी बंदिश मूल स्रोत लिखने वाले या आविष्कार करने वाले के नाम को उड़ाकर जालसाजी करने या मूल स्रोत का उल्लेख करते हुए भी इसका किसी रूप में कमर्शियल उपयोग करने वाले पर होती है। व्यक्तिगत उपयोग पढने-समझने , दोस्तों परिचित को बताने पर कोई बंदिश नहीं होती है। पर वेदों में भी जिस श्लोक को जिस ऋषि ने कहा था, उसका नाम वहां है। महाभारत वेद व्यास ने लिखा था, रामायण वाल्मीकि ने और रामचरित मानस तुलसी ने – यही कहा जाता है , लिखा जाता है। कौन सा उपनिषद किसका है यह कहा जता है; पर कुछ व्यक्ति सनातन धर्म को ही ग्रन्थ मान कर लाभ उठाने की सोचने लगते है। सनातन धर्म नाम का कोई ग्रन्थ नहीं है। इसके बारें में कोई ग्रन्थ नहीं है । भिन्न-भिन्न ग्रन्थों में इसके बारे में या अपने –अपने ढंग से हजारों वर्ष से लोग कुछ न कुछ कहते आ रहे है। यह तो कहना ही पडेगा की रामायण वाल्मीकि ने लिखी थी और रामचरित मानस तुलसी ने? सब कह भी रहे है। सब्जेक्ट एक ही है। पर आजने कितने ग्रन्थ लिखे गये है; पर सब पर अलग-अलग नाम है। यह चोरी –चुहारी का काम आजाद भारत में होने लगा है।

रह गयी खतरे की बात तो इस देश में खतरे ही खतरे है।मुझे खतरा है सम्प्रदायवादी धर्म गुरुओं से; जो इस को अपनी महत्ता के लिए प्रयोग कर सकते है और अपना स्वार्थ सिद्ध कर सकते है। बहुत कम है; पर इनमें ऐसे लोग है। मुझे खतरा है सम्प्रदायवादी संगठनों से जो अपने लाभ के लिए इसको मूल स्रोत का उल्लेख किये बिना प्रयुक्त कर सकते है।

इसमें अनेक राष्ट्रवादी , मानवतावादी, समाजवादी नहीं है।होते, तो यह सोचते कि यदि कोई ऐसा विज्ञान सामने आता है, जो हमारी संस्कृति , हमारे देश के लिए गौरव बन सकता है; तो चलो उसको सहयोग करो, उसे प्रसारित करो, उस व्यक्ति का सम्मान करो। पर ऐसे लोगों को सबसे बड़ा दुःख होता है कि उनकी लाभ उठाने की कल्पना ध्वस्त हो जाती है। यह मैं यूँ ही नहीं कह रहा। एक समूह द्वारा यह प्रयत्न किया गया थ और कड़ी वैधानिक चेतावनी के बाद वह रुका।

एक अन्य बात है कि शंका-प्रश्न-जिज्ञासा चाहे कैसी भो हो; उसमें शिष्टता होनी चाहिए। आपकी बातों में पोस्ट पर तर्क होना चाहिए। आपके गुरु ने क्या कहा है या कौन से ग्रन्थ में क्या लिखा हुआ है, इसका कोई अर्थ नहीं है; क्योंकि यह रिसर्च पुस्तकों से प्राप्त तथ्यों पर आधारित नहीं है। प्राचीन ग्रंथों में जो कहा गया है ; वह कुछ प्रतिशत मात्र है और स्थूल है। वह भी इतने सारे धार्मिक शब्दों , आचरणों में लिपटा हुआ है कि उन तथ्यों को इसके अनुसार बताने में भी मुझे वर्षों परिश्रम करना पड़ा था। उस पर भी इसमें अनगिनत सम्प्रदाय है और सबकी व्याख्या, सबके शब्द, सबके नाम अलग-अलग है। मूल विज्ञान के बारे में यत्र-तत्र ही कुछ प्राप्त हो जाता है; इससे पता चलता है कि उन्हें इसका ज्ञान था; पर इतना डिटेल्स, इतना सूक्ष्म और इतना सम्पूर्ण रूप में कहीं नहीं है। मात्र २० प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध है और जो है वह धार्मिक रूप में है अनेक आवरणों में लिप्त हुआ। गीता बहुत आदर श्रद्धा का ग्रन्थ है; पर उसमें जो कहा गया है , वह यह नहीं है। इसका थोडा सा अंश कृष्ण के विराट रूप के वर्न्न्में है, पर वह कुछ और ही रूप में है; क्योंकि वह एनी विषय से संदर्भित है।

यह सनातन विज्ञानं है। जो सनातन धर्म की परिभाषा है; वह इसी विज्ञान की परिभाषा है, जो परमात्मा से उत्पन्न होता है और सृष्टि के लोप पर उसी में विलीन हो जाता है; पर वह विज्ञान क्या है; यह यत्र-तत्र टुकड़ों में कहीं कुछ धार्मिक रूपकों में कहा गया है। हमारे पास प्रायोगिक विवरण अधिक । विज्ञान के वर्णन नहीं। कुछ डिस्कशनों में इसकी चर्चा है; पर उन्हें आज समझना टेढ़ी खीर है।

एक ने पूछा है कि क्या सपने में आपको ज्ञात हुआ? इस बच्चे को यह ज्ञात नहीं कि १९ वर्ष की उम्र से में स्वयं को भोल्लकर इसमें लगा हुआ हूं । वैसे सपने इतने बुरे नहीं होते। परमाणु संरचना (आधुनिक) का ज्ञान किसी को सपने में ही हुआ था।

सभी वेबसाइटों, फेसबुक आदि पर कॉपीराइट एक्ट प्रभावी होता है। इसके रिकॉर्ड आटोमेटिक होते है की कौन सा पोस्ट कब किया गया है।मैंने अपने सचिव (विशान्त कुमार) को सावधान कर रखा है कि कहीं से कुछ भी लेते हो , तो उसकी वैधानिक स्थिति समझ लो और वहां लिखों कि वह तुमने कहाँ से लिया है। किसी के क्रेडिट को मारनेवाला चोर होता है और उसे चोर ही कहा जाता है।मैं धार्मिक उदाहरण देता हूँ , तो कहता हूँ कि यह धर्म का विवरण है या प्राचीन ऋषियों –विद्वानों ने कहा है; पर वहां भी उनके शब्द नहीं होते । भाव मात्र होते है।

One thought on “आपको ख़तरा किससे है?

  1. Respected Sir,

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    This is for your kind information sir.

    Kind Regards

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