आध्यात्म से ही सुधरेगा जीवन

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बौद्धिक वाद का तर्क-वितर्क और भौतिक वादी जिंदगी की दौर में आज सभी आध्यात्मिक शक्तियों के प्रति संदेह और शंका में पड़े है। वे सोचते हैं क्या सच है, क्या झूठ है; पता नहीं। जितना हम और हमारा बौद्धिक वाद जानता है, उससे अधिक भी कहीं कुछ है, यह संदिग्ध ही लगता है।

परन्तु यही आध्यात्मिक तथ्य जब छोटे-छोटे टुकड़ों में पश्चिमी दुनिया से आता है, तो हम तुरंत उस पर लग जाते है। ध्यान, सम्मोहन , टेली पैथी, रेकी, रिमोट और आकाशीय मार्ग से तरंगों का गमन। हम एक बार भी संशय नहीं करते। हमारा तर्क होता है कि प्रयोग में लाभ सत्यापित होता है ; किन्तु उन्हें सत्यापित किया गया है। उसमें परिश्रम किया गया है और जब हम उसका अभ्यास करते है, तो हमें भी परिश्रम करना पड़ता है। क्या हमने अपने आध्यात्मिक विवरणों का परिक्षण किया है?

भारत में शायद ही ऐसा कोई परिवार हो, जो आध्यात्मिक न हो। चाहे वह खुद की इबादत करता हो या परमात्मा की; चाहे वह मजार पूजता हो या देवी की पिंडी , चाहे वह काली का भक्त हो या राम का। हर एक किसी न किसी ईष्ट को पूजता है और अंधापन देखिये कि आस्था और पूजा दोनों के रहते एक क्षण के लिए भी नहीं सोचता कि लाभ तो ईसा को भी मानने वालों को होता है और पहाड़ पूजने वालों को भी। खुदा की इबादत से भी मन को शान्ति मिलती है, और ‘हे भगवन’ कहने से भी। फिर इनके पीछे सत्य क्या है? क्या है, वह जो प्रत्येक आस्था का पोषण कर रहा है? लाभ तो कुछ न कुछ सबको होता है वर्ना मनुष्य ऐसा लालची प्राणी, जिसको अपनी माता तक पर तभी तक आस्था और प्रेम होता है; जब तक वह उससे कुछ लेता है; हजारों –लाखों वर्षों से केवल आस्थाओं के लिए किसी की पूजा – अर्चना नहीं कर सकता।

लोग गीता पढ़ते है, श्लोक रटते है; कई तो प्रातः सायं गीता-भागवत का पाठ करते है; पर उनके कथनों एवं कथाओं का अर्थ जानने का प्रयत्न नहीं करते कि वास्तव में उनमें कहा क्या गया है? भगवद्गीता पढ़िए। पहला ही परिच्छेद जिस विवरण से भरा है, वह आधुनिक युग के एक मनो वैज्ञानिक सत्य को कह रहा है , ज्ञान और भक्ति की व्याख्या दे रहा है। वह बता रहा है कि आज ‘ज्ञान’ की क्या दुर्दशा है। गीता के श्लोकों के शाब्दिक अर्थों से बाहर जाकर सोचिये। श्री कृष्ण ने स्थान-स्थान पर कहा है कि जो मुझे ‘तत्व रूप’ में जानता है। कभी समझने का प्रयत्न किया है कि यह तत्व रूप क्या है? इसके लिए आपको उपनिषदों के पन्ने पलटने पड़ेंगे। इस रहस्यमय तत्व की चर्चा वहाँ है ; निराकार परमात्मा की; जिससे सभी आकार, गुण, क्रिया, गति, चेतना आदि की उत्पत्ति होती है। इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक अस्तित्त्व रूप और गुण उसी से प्रकट होता है। इसीलिए कृष्ण ने एक स्थान पर कहा है कि हर कोई अपनी आस्था के अनुरूप भूत-प्रेत –पिशाच , पहाड़ , नदी से लेकर भिन्न-भिन्न ईष्टों को पूजता है; परन्तु अंततः वह मेरे ‘तत्व रूप’ को ही पूजता है । अब ऐसे विद्वान गुरु पैदा हो गये है ; जो ‘तत्व रूप’ का अर्थ ‘पंच तत्व’ बताने में लगे हैं; वह भी उन्हें ज्ञात नहीं कि ये ‘पंचतत्व’ हैं क्या? बस शब्द का अर्थ पकड़ कर बैठ गये है, पृथ्वी , वायु, अग्नि, जल और आकाश – फलतः सारे सनातन धर्म का उपहास उड़ा रहे है।

भक्ति , उपासना, साधना सभी करना चाहते है; पर वे इसके अंदर के उन रहस्यों को जानना नहीं चाहते , जो एक ही शक्ति की साधना के हजारों विधियों में समान रूप से व्याप्त है। वे जानना नहीं चाहते कि क्यों दूर्गा जी की उपासना से लाभ होता है; क्यों राम जी की उपासना से। वे मन्त्रों का भी रहस्य नहीं जानना चाहते। वे बस यह जानना चाहते है कि विधि क्या है? पर विधियां तो हजारों है, वे एक –दूसरे की विरोधी भी है। युग, काल, सम्प्रदाय, वर्ग के अनुसार विधियों का निर्माण सबने अपने-अपने ढंग से किया है। लेकिन उन्हें कहिये की आधुनिक युग में अनेक उपकरणों का प्रयोग किया जा सकता है और लाभ प्राप्ति का समय बहुत कम किया जा सकता है; तो वे आपको मुर्ख घोषित कर देंगे ; क्योंकि हर सम्प्रदाय ने अपनी- अपनी कट्टरता के नियमों को फैला रखा अहि और उसे अधिक शक्तिशाली प्रकट करने के लिए नियमों – विधियों का ऐसा मायाजाल खड़ा कर दिया है कि आप जीवन भर सुबह 4 बजे से एक बजे रात तक लगे रहे और मैं दावे के साथ कहता हूँ कि मिलेगा कुछ नहीं; क्योंकि विधियों के इस महाजाल में कभी भी मानसिक शक्ति एकाग्र नहीं होगी। जहाँ यह मूलरूप में संस्कृत में विद्यमान है; वहां के विवरण पढेंगे, तो स्पष्ट पता चल जाएगा कि ये सामान्य लोगों के लिए है ही नहीं। राजाओं , धन कुबेरों और जमींदारों को प्रभावित करने के लिए सब ने जटिल से जटिलतम बना दिया है।

तन्त्र के जो वास्तविक प्रसिद्ध विद्वान है ; जो प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध है; उनमें इसके विद्वान आचार्यों ने खुलकर कटु शब्दों में इसकी आलोचना की है और इन्हें पशु-साधक (पाश बद्ध साधक) कहा है । उन्होंने कड़े शब्दों में पूछा है कि नियम बनाने वाले आप कौन है? प्रकृति पर परमात्मा के नियम लागू है और जो भी होगा, वह उसके अनुरूप होगा। इन्होंने कहा है कि अपने-अपने नियमों को निर्मित करके अपने को और भी जड़ कर लिया है। भला एक टांग पर खड़ा होने से सिद्धि मिलती है ? दूसरी टांग ही बेकार हो जाएगी। जटाएं बरगद के वृक्ष में बहुत होती है, तो क्या उसको परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है? बहुत से जीव छ: महीने तक भोजन-पानी न लेकर समाधि में रहते है; तो क्या उन्हें अतिरिक्त चमत्कारिक शक्ति मिल जाती है? मेढक को सांप खा जाता है , सांप को नेवला। वे तो अपनी रक्षा में भी असमर्थ होते है।

यदि आप चाहते है कि आपको वास्तव में कुछ प्राप्त हो; तो इसके विज्ञानं को समझिये। प्रकृति की उस प्राकृतिक क्रिया को जानिये, जिनसे यह सम्भव होता है । परमात्मा केवल मनुष्यों का परमात्मा नहीं है।प्रकृति के हर इकाई का परमात्मा वही है। शेर के लिए प्राप्ति के जो नियम है ; वही गिद्ध के लिए भी हैं, वही बगुला के लिए भी है, वही आपके लिए भी है। मेढक -मछली ने पानी में तैरना चाहा , वे वैसे ही बन गये , जिराफ ने ऊंचे वृक्षों के पत्ते खाने चाहे, उसकी गर्दन लम्बी हो गयी। डिस्कवरी जैसे विदेशी चैनलों पर जंतु जगत की जानकारियाँ देखेंगे , तो एक ही जीव में समय-काल-स्थान के अनुरूप कई स्थानों में गुण –आकृति – प्रवृति में अंतर दिखाई देगा। जिसकी जैसी आवश्कयता थी, उसने उधर अभ्यास किया और पाया। यही आध्यात्मिक सूत्र भी है ( पढ़िए धर्मालय के वेबसाइट पर ‘अभाव के नियम’ ) । आवश्यकता की तड़प उत्पन्न करनी होगी; कोई गुरु न होगा , तब भी सिद्धि मिलेगी, भले ही समय चार-गुणा लगे या पांच गुणा। जहाँ आपको कोई जानकारी नहीं , जिस क्षेत्र को आप नहीं जानते, जहाँ कोई मनुष्य न हो , जहाँ बबूल के जंगल खड़े हो; वहां भी भूख-प्यास लगे और कोई मनुष्य फंसा हो, तो कुछ न कुछ खाने- पीने के लिए ढूंढ लेता है। परिंदे मार्ग दर्शन कर देते है, खरगोश बिल्ली जैसे जंतु गुरु बन जाते है।क्यों? आवश्यकता की व्याकुलता अपने अभाव की पूर्ती में लग जाती है और बबूल के बीच कहीं बेर मिल जाता हैं , कहीं अमरुद। प्यास बुझाने के लिए भले ही पानी न मिले, पर कुछ न कुछ निश्चित मिलेगा। प्रकृति भी अभाव के सूत्र पर काम करती है। देखते नहीं, गर्मी में तरबूज , खीरे, ककड़ी उत्पन्न करती है ; जाड़े में मटर – गोभी, आलू। गर्मी के समय कुएं या ट्यूबवेळ से ऊपर का पानी छोड़ दीजिये, नीचे ठंडा पानी मिलेगा, जाड़े में वही वह गर्म मिलेगा। अब वह पानी आप डोल से निकलाते है, रस्सी डालकर निकालते है या कैसे करते हैं, यह है विधि। इसका चुनाव परिस्थिति , काल, पहले से प्राप्त जानकारी , व्यवहारिक सोच आदि पर निर्भर करता है। पहले तालाब नदी हो, फिर कुआं सामने आया , फिर हैण्ड पंप आया, फिर मोटर लग गये। पर सिद्धियों के मामले में हम 10000 वर्ष पहले की विधियों को पकडे बैठे है। यह जड़ सोच है । आध्यात्मिक प्राप्तियां प्रकृति के नियमों से परे किसी लोक के नियमों से नहीं होती। यदि पानी निकालने के लिए मोटर लग सकता है; तो सिद्धियों में भी लग सकता है। जिसने भी पानी निकालने की सरल विधियों को ढूँढा, वह उस विगयान को पकड़कर सफल हुआ कि पानी ऊपर आता कैसे है? कौन सा सूत्र काम करता है? पर हम आध्यात्मिक सूत्रों को जानना नहीं चाहते । बस इस पर विश्वास करते है कि आँखें फोड़ लो, परमात्मा के दर्शन होने लगेंगे।

विश्वास नहीं हो रहा ना? एक काम कीजिये , विष्णु सहस्त्रनाम , गायत्री मन्त्र, प्रणव मन्त्र, शिव-हनुमान जी आदि के स्त्रोत , चालीसा आदि के कैसेट बाजार में बिकते है। कमरे को साफ़ सुथरा करके धूप-दीप दिखाकर मध्य में साधारण सुखासन पर बैठे । मुंह-आसन-दिशा आदि उस देवता के अनुरूप रखें। उसे प्लेयर में लगायें। कानों पर हेड फोन चढायें और थोड़ी डेप्थ की आवाज में बजाए और ध्यान में ध्यान रूप की ज्योतिर्मय छवि केन्द्रित करें। दस मिनट में मालूम हो जाएगा कि मैं क्या कह रहा हूँ।

 

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One Comment on “आध्यात्म से ही सुधरेगा जीवन”

  1. आप ने बहुत ही मारमिक बात की है अधयातम को अच्छी तरह समझाया है धन्यवाद।

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