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आध्यात्म में ‘अणुमल’ क्या है?

मूलतत्व यानी वह परमात्मा; जिसे वैज्ञानिक भाषा में 0 कहा जा सकता है; निर्मल होता है। इसीलिए ‘अघोर’ (निर्मल) कहा जाता है। इसमें ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति तीन पॉवर पॉइंट वाले परमाणु के रूप में होती है।

चेतना इसके नाभकीय केंद्र में उत्पन्न होती है। जैसे ही वह परमाणु अस्तित्त्व में आता है, स्व के अहंकार बोध से युक्त हो जाता है। यह स्थिति विकाशशील ब्रह्माण्ड की प्रत्येक इकाई की होती है। सब मूलतत्व (0) की धाराओं से बने एक सर्किट होते है; पर स्वयं को अस्तित्त्व मानकर क्रियाशील रहते है। इस ‘अज्ञानता’ को ही प्राचीन ऋषियों एवं तंत्राचार्यों ने अणुमल यानी अणुविकार कहा है।

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