आध्यात्मिक सत्य क्या हैं?

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एक कहता है परब्रह्म सत्य है , बाकी सब बकवास । कोई शिव को परमात्मा मानता है , कोई परमात्मा को निराकार, निर्गुण मानता है, कोई विष्णु का नाम जपता है , कोई देवियों की गाथा गाता है। किसी का कहना है कि खुदा ही एक मात्र सत्य है, तो कोई कहता है कि सारा सत्य ब्रह्मा में ही छुपा है। परन्तु हमे यह समझना चाहिए कि ये सारी व्याखाएं भिन्न-भिन्न समुदायों एवं सम्प्रदायों से सम्बन्धित है। एक ही सत्य को अलग -अलग रूपों में व्यक्त किया गया है। किसी ने हाथी के पैर की बात की हैं, तो किसी ने सूंढ़ की, कोई पूंछ की बात बताता है , तो कान की। और इसमें कठिनाई यह है कि सबने अपने अपने नाम दे रखें । सनातन धर्म को बिना प्रारम्भ से अंत तक आधुनिक वैज्ञानिक स्वरुप में जाने, इन सबके रहस्य को नहीं समझा जा सकता। शिव और शिवलिंग की बात करने वाले लोग नहीं जानते कि वे वास्तव में क्या है? जब भी पूछा जाता है , तो वे धडाधड प्राचीन श्लोकों एवं धार्मिक आस्थाओं का व्याख्यान दने लगते है। इस प्रकार एक भ्रम पैदा होता है, जानकारी कुछ भी नहीं मिलती और ठीक-ठीक कुछ भी ज्ञात नहीं होता। उसपर आधुनिक काल में अत्यंत महान गुरुओं की भरमार हो गयी है और इतने प्रकार की मिथ्या बाते लोगो के मस्तिष्क में घर कर गयी है कि सत्य वे जानना ही नहीं चाहते।

समस्त प्राचीन आचार्यों ने इसको पूर्वाग्रह से भरा संस्कार कहा है। इनसे मुक्त हुए बिना सत्य का ज्ञान नहीं होता।हमे विश्वास है कि पृथ्वी सूर्या का टूटा एक हिस्सा है , तो कोई भी उस व्यक्ति को नहीं समझा सकता कि सत्य कुछ और है? इसी प्रकार सब अपने अपने गुरुओं की पूजा कर रहे है और जो सत्य भी कहते है उसको अपने अनुसार समझ रहे है। भारत में प्राचीन ऋषियों एवं अवतारों की एक लम्बी श्रृंखला रही है । उनको पढने पर यह ज्ञात होता है कि आज हम बहुत सी अनर्गल बातों में विश्वास कर रहे है या उनके कथन को समझ ही नहीं पा रहे है । आज कल यह स्लोगन है कि ये सारी बाते आस्था से सम्बन्धित है। जबकि यह सत्य नहीं है , यह विज्ञान है और शुरू से अंत तक पूरी तरह प्रकाशित है।इन्हें हम कैसे समझ सकते है जब योग मुद्रा को योग कहे , पृथ्वी का अर्थ पृथ्वी ग्रह ले लें और तमाम धार्मिक शब्द गंगा, जमुना, सरस्वती , कैलाश , काशी आदि के ऊर्जा चक्र की महत्ता समझे बिना इनके नाम पर नामांकन किये गये पहाड़ों एवं नदियों में उन बातों को ढूँढने लगे ; जो वस्तुतः परा विज्ञान से सम्बन्धित है। परा का अर्थ ही है कि जो सामान्य अनुभूति से ही परे हो। हम एक बार फिर अनुरोध करना चाहते है कि अपने अपने गुरुओं पर आप आस्था रखते है , तो रखिये , मेरी उनपर कोई आस्था नहीं है। जो अज्ञानी योग मुद्राओं को योग कह रहा हो , जो लोग काल्पनिक लोक-परलोको की व्याख्या कर रहे हो , जो यह कह रहे हो की हमारे पास आओ हम सर पर हाथ रखकर तुम्हारे सारे कष्ट दूर कर देंगे । ऐसे लोगो पर हम विश्वास नहीं करते क्योंकि एक लम्बे समय से मैं देख रहा हूँ कि ऐसे लोगो का कोई स्टैंड ही नहीं है। कभी वो अमरता प्राप्त करने की जड़ी ढूढ़ लेते है , तो कभी यह कहने लगते है कि सिर के बल खड़े हो जाओ इससे परमात्मा की प्राप्ति हो जायेगी। प्राचीनकाल में प्रसिद्द आचार्यों ने ऐसे लोगो की खिल्ली उड़ा रखी है और सत्य को वैज्ञानिक रूप में समझने के लिए पूर्वाग्रहों एवं संस्कारों से परे होकर सत्य को समझने का निर्देश दिया है

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6 Comments on “आध्यात्मिक सत्य क्या हैं?”

  1. कृपाकरके सनातन धर्म मु्ख्य धारा का उल्लेख करें !
    -सानुरोध ॥सृजन॥

  2. लेखक का रोष सही ही है। सत्य खुद ही को भाषा। किसी का भी वर्णित सत्य हमें नहीं हजम होगा। हमें खुद अपना अनुसंधान कर उसे महसूस करना होगा।

    1. आपकी टिपण्णी के लिए धन्यवाद. कृपया धर्मालय के अन्य विषयों को पढ़ें और इसके प्रसार में सहायता प्रदान करें. ज्ञान का प्रसार ही जीवन का उद्देश्य होना चाहिए.

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