आचरण का आडम्बर और आध्यात्म

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जितने भी संस्कार है , वे सारे नियम सामाजिक है। प्रकृति का इससे कुछ लेना देना नहीं है। और कोई भी नियम ऐसा प्रकृति में नहीं है जिसे केवल मनुष्यों के लिए बनाया गया हो। अपवाद के नियम हमेशा कृत्रिम होते है और इनका सम्बन्ध लौकिक धर्म से होता है। लौकिक धर्म एक सामाजिक व्यवस्था कायम करने के लिए मानव द्वारा निर्मित होते है। ये परमात्मा के नियम नहीं है।वह आध्यात्म हमेशा प्रश्नों के घेरों में रहता है ; जो किसी विशेष समुदाय से सम्बन्धित हो। परमात्मा ने एक के लिए कुछ और नियम बनाया हो और दुसरे के लिए कुछ और , यह सोचना ही अज्ञानता है। सोलह संस्कार केवल एक समुदाय की मान्यता है । सम्पूर्ण मानव समाज की नहीं। प्रकृति के अन्य जीवों की नही।इसी प्रकार मांसाहार या मदिरापान की वर्जना एक समुदाय में मान्य है। इसे इसलिए निषिद्ध माना जाता है कि ये मस्तिष्क एवं रक्त में उत्तेजना पैदा करते है। और उस उत्तेजना पर नियंत्रण करना सभी के बस का रोग नहीं होता। जहाँ तक आध्यात्म से इसके सम्बन्ध का प्रश्न है , यह सत्य है कि इसका उससे कुछ भी लेना देना नहीं है।

भारत में शैवमार्ग, देविमार्ग,आदि को भी सनातन धर्म ही माना जाता है और देश विदेश की लाइब्रेरीयों में हजार वर्ष से अधिक पुराने ग्रन्थ पड़े हुए है जिनमें इन आधा दर्जन मार्गों में जितनी भी सिद्धि साधनाएं की जाती हैं उनमें मदिरा या मांसाहार की वर्जना नहीं है। वैदिक मार्ग में भी अनेक प्राचीन ग्रंथों में यज्ञ में पशुबलि , भोज में मांसाहार के विवरण मिलते है। अब जबरदस्ती कुछ लोग बौद्ध एवं जैन दर्शन के आदर्शों को वैदिक धर्म पर या वैदिक संस्कृति पर थोपे जा रहे है, तो यह उनकी अपनी मान्यता है । इनको धर्म कहकर और आध्यात्मिक विकास कहकर थोपेंगे , तो हिन्दुओं की 70% आबादी ; जो बंगाल , बिहार, आसाम आदि समुद्री किनारे पर है या जो हिमालय के तराई क्षेत्र में है उन सबको पापी , दुष्टात्मा कहकर सनातन धर्म से बहिष्कृत कर देना पड़ेगा और सारे प्राचीन ग्रन्थों को भी जला देना पड़ेगा। जिसमें शिव पुराण और विष्णु पुराण जैसे ग्रन्थ भी है और एक नया सनातन धर्म स्थापित करना होगा।जिसमें यह कहा गया हो कि कि साँस मत लो उसमें बहुत सारे जीव-जन्तु मर जाते है , मच्छर को मत मारों क्योंकि वह हिंसा है। घर को साफ़ सुथरा मत करो क्योंकि बहुत से जीव जन्तु मर जाते है। अनाज मत खाओ क्योंकि वह वनस्पतियों के अंडे है।इस प्रकार हम एक अव्यवहारिक धर्म की स्थापना करने में लग जायेंगे।

भोजन और आचार व्यवहार स्थान विशेष पर उपलब्ध सामग्रियों के आधार पर मानव सामाज ने अपनाया है।इसका आध्यात्म से क्या लेना देना? क्या मांसाहार न करने वाले या मदिरा न पिने वाले सभी संत महात्मा होते है? मैं पत्रकार रहा हूँ और मैंने ऐसे लोगों में भद्र आचारण का आडम्बर करके क्रूरता की पराकाष्ठा अपनाने वाले अनेक लोगो को देखा है। यदि ऐसे लोग धार्मिक है , तो उस धर्म से अलग हटकर नास्तिक बन जाना ही अच्छा है।

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