आप यहाँ हैं
धर्मालय > धर्म का ज्ञान क्षेत्र > अहं ब्रह्मास्मि

अहं ब्रह्मास्मि

सनातन धर्म का विज्ञान कहता है कि उस परमात्मा (पर ब्रह्म) ने अपने ही अस्तित्व से प्रकृति को निर्मित किया और फिर स्वयं उसमें, उसकी रग-रग में समाकर उस अस्तित्त्व की रक्षा करने लगा।

तंत्राचार्यों ने कहा है कि उसने स्वयं अपने अस्तित्व से अणु (परमाणु) को उत्पन्न किया है और उसके केंद्र से समस्त अस्तित्त्व में स्वयं अपनी ही धारा प्रवाहित करने लगा।

सनातन धर्म का एक सूत्र कहता है , ‘यथा ब्रह्माण्ड , यथा पिण्डः’। अर्थात जो संरचना , क्रिया, नियम ब्रह्माण्ड के अस्तित्त्व और संरचना के हैं, वे ही इकाइयों के हैं।

अब इन दोनों कथनों को मिला दें , तो परिणाम कहता है कि प्रत्येक इकाई ब्रह्म का ही एक रूप है। इसी को सामान्य भाषा में परम्परा से कहा जाता रहा है कि वह परमात्मा कण-कण में विद्यमान है।

जो ब्रह्माण्ड के केंद्र में है; वह भी शुद्ध पर ब्रह्म ही है; पर एक संरचना में बंध जाने के कारण उसे ब्रह्म (प्रकृति में बंधा ब्रह्म) कहा जाता है। उसी के कारण समस्त ब्रह्माण्ड क्रियाशील है और उसी की क्रिया से सभी क्रियाशील हैं। यह लड़ी क्रमबद्ध श्रृंखला के रूप में एक के अंदर अनेक के क्रम में हैं। इसे धर्म ग्रन्थों में प्याज की परतों की भाँती उदाहरण दिया गया है; पर यह सटीक उदाहरण नहीं है। सटीक उदाहरण है हमारा शरीर, जिसमें कई ऊर्जा परत है, कई ऊर्जा उत्पादन बिंदु हैं और उनसे अनंत कोशिकाओं का संसार व्याप्त है। सबका अपना जीवन है, पर जीवियों तक का।

पर सब में वही परमात्मा है। सनातन धर्म के पौराणिक संतों ने कहा है कि व्याधा  तोते के फंसाने के लिए के एक तागा उमेठ कर दो खम्भों में बांध देता है और बीच बीच में बांस की कपची (छोटी पट्टी) लगाकर मिर्च फंसा देता है। तोता उसे खाने के लिए उस पर बैठता है और  उल्टा लटक जाता है। उसे ज्ञात ही नहीं रहता कि वह उड़ सकता है और लटका चीखता रहता है और पकड़ा जाता है।

इसी बात को तंत्राचार्यों ने कहा है कि अणु में बद्ध वह परमात्मा आणविक मल (विकार) से ग्रसित होकर अज्ञानी बन जाता है । उसे अपनी संप्रभुता का ज्ञान नहीं रहता और वह स्वयं को अणुरूप (शरीर/जीवात्मा) समझकर असमर्थ हो जाता है।

फिर एक खेल शुरू हो जाता है । कामना और पौरुष का खेल। जिसके नियम शाश्वत है। इन नियमों के अंतर्गत सबही क्रियाशील हो जाते हैं और जीवन मृत्यु के अनंत चक्र में बंधकर बार-बार जन्म लेकर कष्ट भोगते है।

सभी सुख की तलाश में क्रियाशील है; पर इस प्रकृति में सुख कहाँ। कामना के कारण दुःख होता है और कामना का कोई अंत ही नहीं है। मरने के बाद भी अपूर्ण कामनाओं का दुःख अनुभूतियों के कष्टकर संसार को बनाता रहता है।

हमारी (स्त्री/पुरुषों) की सबसे बड़ी समस्या यह है कि हमें ज्ञात ही नहीं है कि हममें कितनी शक्ति है और हम वास्तव में ठान लें और उचित मार्गदर्शन मिले तो हम क्या नहीं कर सकते। कोई रोग से त्राहिमाम कर रहा है, कोई पारिवारिक और दाम्पत्य समस्याओं से जूझ रहा है , तो कोई अभिचार कर्मों से परेशान है , किसी को नौकरी नहीं मिलती, तो किसी को प्रेमिका और प्रेमी नहीं मिलता  और तब उन्हें उचित आध्यात्मिक मार्गदर्शन और संकल्प के स्थान पर ऐसी शक्ति की तलाश होती है, जो हाथ हिलाए और समस्या दूर हो जाए।

चमत्कार होते हैं। समस्याओं रोगों के चमत्कारिक निदान होते अहिं; पर थोडा विचार कीजिये।ये सनातन विगयान एवं तन्त्र के सूत्रों पर आधारित होते है। जैसे वैज्ञानिक नियमों से चमत्कारों की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार इनके भी नियम सूत्र है। ये मंत्र पढने और हाथ हिलाने की केवल विधि नहीं है।

अपने कष्टों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए, रोगों से मुक्ति के लिए , कामना की पूर्ती के लिए सबसे पहली बात स्वयं की शक्ति पर विश्वास उत्पन्न करना नहीं है। किसने कह दिया कि आप असमर्थ है। उदाहरण के लिए जो नौकरी तलाश रहे हैं, उनकी कामना धन कमाना है, नौकरी नहीं। वह मस्तिष्क लगाये, उचित मार्गदर्शन प्राप्त करे और परिश्रम कर, तो 1000 रु से कुछ करके भी लखपति करोड़पति बन सकता है। मैं जब बच्चा था, तो मेरे पिता के एक मित्र का लडका था। वह उस समय भी करोड़पति बाप का इकलौता वारिस था। मात्र 18 वर्ष का और वह करता क्या था ? ऑक्शन में कपड़े , कंघी, पेन खरीदता था और शाम में बोर्ड लगा कर बेच देता था। बाजार से 25% मूल्य पर सामान दो घंटे में साफ़ हो जाता था। दो हजार की पूंजी, एक हजार का मुनाफा।

हमारी अनेक समस्याओं का कारण आत्म गौरव काअभाव है। आत्मविश्वास का अभाव। एक चीटी को बाल्टी भरे पानी में डालिए और एक पत्ता भी। वह उस पत्ते पर चढ़े तो फिर पानी में डाल दीजिये। वह बार-बार पत्ते पर चढ़ेगी। हारकर डूबने के लिए शिथिल नहीं होगी। फिर हम मनुष्य होकर निराश क्यों होते है? सब कीजिये। रोग है, दवा कीजिए, समस्या है उपचार कीजिये , कामना है तन्त्र-मंत्र की क्रिया कीजिये’ परन्तु यह सब पांच गुणा अधिक शक्तिशाली होकर फलीभूत होगा, जब स्वयं पर और स्वयं क्रियाओं पर विश्वास होगा।

वर्ना गुरु भी क्या करेगा? भगवान भी क्या करेगा?.. कोई अभिचार कर्म या तन्त्र-मंत्र भी क्या करेगा? कोई खाना बनाकर सामने रख दे और न उसे खाने पर विश्वास हो , न ही अपनी पाचन शक्ति पर तो वह खा भी लिया, तो शरीर में नहीं लगेगा। प्रकृति का यही नियम है। जिसमें रुचि नहीं, विश्वास नहीं, वह आपके लिए है ही नहीं। तन्त्र में इस नियम से खाए विष को भी निष्प्रभावी बनाने के प्रयोग है।

उठ कर खड़े हो जाईये। जीवन में कुछ करने अपनी कामनाओं को फलीभूत करने के लिए। आप असमर्थ नहीं है। आप ही ब्रह्म है। आप सब कुछ कर सकते हैं। हमारी वेबसाइट पर जाईये । अपनी समस्याओं का निदान ढूंढिए।आपको अपनी समस्याओं का निदान वहां मिलेगा। सशुल्क भी, निःशुल्क भी। बल्कि निःशुल्क का दायरा बड़ा है।

 

2 thoughts on “अहं ब्रह्मास्मि

  1. guruji mujhe apki rachnaye achchi lagti hai.mai roj rat ko net par padta hu.dhanyawad itne gyanwardhak bato se bhi jigyasa sant nahi hoti hai,mai ek inter pass garib ladka hu paise aur kismat ne mera sath nahi diya .mai topper hokar bhi age pad nahi paya.koi bhi kam me success nahi milta margdarsan kijiye please
    name durgesh mirjha
    birth day 14/06/93/4.30am/
    adress raipur c.g.
    m.n.9630307757

      1. दुनिया में बहुत से लोग पद लिख नहीं पाए ,पर पर आज उनकी सफलता के किस्से आम हैं.हमारी सबसे बड़ी कमजोरी यह है की हम खुद को दीं हीन समझ लेते हैं ,निर्मावाले ने साईकिल पर गूम गूम कर ढेर साड़ी असफलताओं को झेलते हुए कम किया और आज जाने कितने उनके यहाँ नौकरी करते हैं .यह अनेकों व्यक्ति की कहानी रही है. अपने आस पास देखो ,कोई छोटा ही सही काम शुरू करो ,मार्ग अपना ही मष्तिष्क दिखता है .वहां शिव पार्वती रहते हैं .कोई उनसे पूछता ही नहीं. छोटा बीज ही बरगद का पेड़ बन जाता है .बड़े में बहुत म्हणत करनी पड़ती है और उसके लग जाने की भी कोई गारंटी नहीं होती .

      Leave a Reply

      Top