अभिचार कर्म में अघोर तंत्र की पुतली विद्या का प्रयोग

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प्रश्न – तन्त्र में पुतली प्रयोग क्या है? इस रहस्यमय विद्या पर कुछ प्रकाश डालिए।

उत्तर – जो ज्ञात न हो, वह रहस्य होता है। परन्तु; इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण होते है। सूत्रों एवं नियमों का ज्ञान न होने के कारण आधुनिक वैज्ञानिक जगत इसे अंधी आस्था कहता है और सामान्य आदमी कालाजादू । सामान्य तांत्रिकों और तंत्र ओझाओं को इस विद्या की अन्दूरनी बातों का ज्ञात नहीं होता, इसलिए तामझाम दिखाकर भयादोहन करते है। यह विद्या इतनी सरल नहीं है।सभी कुछ जानने के बाद भी इसे करने के लिए जिस साहस और विश्वास की जरूरत होती है; वह सामान्य साधकों के भी वश क रोग नहीं है। उसपर तांत्रिक क्षेत्र के विस्तृत ज्ञान की भी आवश्यकता होती है। यह एक अविगुप्त विद्या है और महाकाल , देवी एवं अघोरपंथ के गुप्त साधकों के पास पाई जाती है। इस पर मैंने प्रयोग किये थे। एक- दो पीड़ितों का निदान भी किया था। इस पर ‘जी न्यूज चैनल’ के ‘काल – कपाल-महाकाल’ में एक निदान को शूट करके दिखाया भी गया था।

अघोरपंथ के एक जंगलवासी साधक से इस विद्या को सीखने के लिए पहली बार मुझे ज्योतिष की भी शिक्षा उससे लेनी पड़ी थी। यह विद्या इस प्रकार है –

पुतली विद्या का स्वरुप और विधि प्रक्रिया

इसी प्रकार की एक विद्या अफ्रीका में भी ‘वुडु विद्या’ के नाम से चर्चा में रही है ; पर उसकी प्रकिया मुझे ज्ञात नहीं है। हमने अघोरपंथ की प्रक्रिया को सिद्ध करके देखा था। यह एक विद्या है और केवल विनाशक नहीं है। इससे दूर बैठकर किसी भी स्त्री-पुरुष के गंभीर लाइलाज रोगों की भी चिकित्सा की जा सकती है और इसका उपयोग वशीकरण, मोहन, स्तम्भन से लेकर मारण कार्यों तक किया जा सकता है।

पहला चरण – शत्रु के नक्षत्र का ज्ञान करना।

दूसरा चरण – साध्य के नक्षत्र वृक्ष, उसके बाल या अधोवस्त्र, काली मिट्टी का सात बार जल में घोलकर कपड़े से छने पानी में बैठी मिट्टी, चिता या साध्य के प्रयोग की वस्तु को जलाकर की गयी राख, नमक (सेंधा), सोंठ, पीपल , काली मिर्च , रसोई की कालिख , लहसुन , हिंग, गेरू, पीली सरसों , काली सरसों, ईख का रस या गुड़ , नीम की छाल का पिष्ठ आदि वस्तुओं का कर्म के अनुसार चयन किया जाता है। इसके बाद उड़द के आटे से पुतली का निर्माण होता है। बालों से बाल एवं रोमों की स्थापना की स्थापना की जाती है।

तीसरा चरण – यह पुतली नक्षत्रों के चारों चरणों के अनुसार अलग अलग होती है यानी 27×4 = 108 प्रकार की। इन सबकीलम्बाई अलग – अलग होती है (गुप्त)

चौथा चरण – पुतली की जो भी लम्बाई हो, उसके सिर से गर्दन का हिस्सा भाग , कमर से कंधों अक हिस्सा – 4 भाग एवं कमर से नीचे का हिस्सा उभाग होता है।

कर्म विधि

  1. सबसे कठिन इसकी विधि प्रकिया है। राध्य की लग्न या चन्द्र राशि, से अशुभ कर्मों के लिए अष्टम और शुभ कर्मों के लिए पंचम भाव की स्थिति का प्रयोग किया जाता है। अशुभ कर्मों में जब अष्टम भाव (लग्न राशि में) दुर्बल और पंचम भाव बली होता है।
  2. इसके अतिरक्ति समयकाल की राशि को भी इसी के अनुरूप चुना जाता है।
  3. प्रत्येक स्त्री/पुरुष के शरीर में अमृत स्थान एवं विष- स्थान होते हैं। इनकी गति और व्याप्ति भी महीने के 30 दिन में चन्द्र तिथि के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है। पुरुष एवं नारी में यह स्थिति विपरीत क्रम में होती है। कर्म के अनुसार इसका भी चयन करना होता है।

प्राण – प्रतिष्ठा

इसके बाद इस पुतली की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। इसकी एक अलग प्रकिया है।

इसके बाद क्रियात्मक और हवन आदि

प्राण प्रतिष्ठा के बाद वशीकरण , आकर्षण , विद्वेषण , स्तम्भन , उच्चाटन और मारण की क्रियाएं शुभाशुभ भेद से तिथि , आकल, राशि-साध्य का शुभाशुभ काल आदि देखकर किया जाता है। ज्योतिष के अनुसार विषयोग , मृत्यु योग, शूल योग, कंटक योग आदि अशुभ और इसी प्रकार शुभ योगों का चयन करके क्रिया की जाती है।

यह एक जटिल तंत्र क्रिया है। इन सारी क्रियाओं को करने में महीनों का वक्त लगता है।

होता क्या है?

किसी भी व्यक्ति के बाल, दांत आदि शरीर से अलग होकर तुरंत निष्क्रिय नहीं होते। ये 90 दिनों तक तो अपने आप ऊर्जा का उत्पादन करते रहते है और यह ऊर्जा उस व्यक्ति के शरीर की ऊर्जा के पॉजिटिव होती है। इसका रिसीवर केवल उस व्यक्ति का शरीर होता है। पुतली को छेदने, काटने , तपाने , द्रव्य में डालने आदि का प्रभाव उस स्त्री/ पुरुष पर होता है शक्तिशाली होता है। वह पृथ्वी पर कहीं भी हो, उसको प्रभावित करती है।

निदान

यदि कोई व्यक्ति स्त्री या पुरुष इससे पीड़ित है। कहीं कोई ऐसी तन्त्र क्रिया किया करता है, तो उसे ढूंढना और पुतली को नष्ट करना असम्भव है। इसके द्वारा तेज दर्द, सुई चुभने या भाला मारने जैसी पीड़ा , काटने – चीरने जैसी पीड़ा , ज्वर , उन्माद आदि भयानक रूप ले लेता है। जब तक पुतली पर अत्याचार होता रहेगा , पीड़ित भी पीड़ित रहेगा। कोई उपचार कारगर नहीं होगा। जो लोग इस विद्या को जानते मिले, उनका निदान एक मात्र था; पुतली ढूंढ कर नष्ट करो।

पर इसका एक निदान और भी रूप में पूर्णतया संभव है, जिसको मैंने करने जी न्यूज चैनल वालों दिखाया था। जप पीड़ित है, उसका पूरा ऊर्जा समीकरण ही बदल दो। वह उस पुतली की तरंगों का नेगेटिव रहेगा ही नहीं और वे अपने टारगेट को ढूंढती ही रह जाएगी।

कितने विस्मय की बात है। मिसाइलों , मोबाइल फोन, रेडियो सिग्नल , विभिन्न प्रकार के सेंसरों में इन्ही तरंगों की क्रियाएं होती है और सूत्र भी यही होता है; पर जब इस प्रकार की क्रियाओं की बात होती है; व्यक्ति इसे या तो चमत्कार समझ लेता है या काला जादू। हम लाख समझाएं लोग मानने के लिए तैयार नहीं कि यह कोई जादू नहीं है, इनमें भी वैज्ञानिक सूत्र ही काम करते हैं।

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One Comment on “अभिचार कर्म में अघोर तंत्र की पुतली विद्या का प्रयोग”

  1. Jaisa ki aapne kaha ki agar पुतली को नष्ट नहीं कर पाते किसी कारण वश तो उससे बचने का दुसरा तरीका ये है कि ऊर्जा के समीकरण को बदल दिया जाए ,”उस पुतली का नेगेटिव रहेगा ही नहीं और वो अपना टारगेट ढुँढ नहीं पायेगी” इस वाक्य को जरा विस्तार से explain kijiye

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