अपराजिता (CLITORIA TERNATIA)

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भारत की चमत्कारिक वायरस रोधी वनस्पतियाँ

अपराजिता (CLITORIA TERNATIA)

 (भूत बाधा , पिशाच बाधा , पागलपन , हिस्टीरिया , मिर्गी, विषविकार दूर करने वाली चमत्कारिक औषधि)

रोग नाशक

सफ़ेद फूल- दृष्टि दुर्बलता , कब्ज , मस्तक शूल , डाह, कोढ़, पेट का दर्द , पित्त रोग , सूजन , बहरापन , मस्तक रोग एवं  सर्प विष नाशक .

नीला फूल – उपर्युक्त के अतिरिक्त यह पेचिश और कामशक्ति दुर्बलता को दूर  करने वाली गर्भपात को रोकने वाली है .

ब्रिटिश कालीन सरकारी शोध

ब्रिटिश काल के एक शोधकर्त्ता मेटेरिया मेडिका के डॉक्टर नाड करनी, वाँ . आर. ऐन. और डॉक्टर ए. सी . मुखर्जी के अनुसार  –

यह वनस्पति जलोदर , प्लीघ और यकृत वृद्धि में बहुत लाभकारी है . क्रुप खांसी में भी यह औषधि विशेष उपयोगी है.

उपयोग

  1. सभी प्रकार के मानसिक रोग, हिस्टीरिया , मिर्गी , भूत-प्रेत , पिशाच बाधा , दौरे आदि में सफ़ेद अपराजिता की जड़ की छल का रस 5 ग्राम चावलों के धोवन और घी के साथ पिलाने से लाभ होता है और महीने तक जारी रखने पर रोग दूर हो जाता है.
  2. अपराजिता की छाल को दूध में पीसकर शहद में मिलाकर (छाल 6, शहद 12, दूध 100) पीने से गर्भपात नहीं होता.
  3. इसके बीजों को भूनकर पीसकर डेढ़ ग्राम की मात्रा से 3 ग्राम तक देने से कुछ दिनों में प्लीहा यकृत का बढ़ना रुक जाता है और धीरे धीरे सामान्य हो जाता है .
  4. यह विषाणु जीवाणु नाशक है . क्रमांक 3 – 15 दिन प्रयोग करने से शरीर और  जड़ का हवन धूप करने से वायु शुद्ध होती है .

सर्पविष में उपयोगी

गुजरात के एक ब्रिटिश कालीन प्रसिद्द वैद्य और शोधकार्य के अनुसार  यह वनस्पति फन वाले भयानक विषवाले साँपों के जहर से प्राण बचाने में सक्षम है .

जड़ का चूर्ण या कल्क 15 ग्राम घी के साथ –  चमड़ी का जहर , ढूध के साथ – खून का जहर  कूट के समान के साथ 15 ग्राम दूध के साथ – मांस का जहर , हल्दी के चूर्ण और इसकी जड़ के चूर्ण का 15 ग्राम – हड्डी का जहर , ईसर मूल के साथ देने से – मज्ज में पहुंचा जहर निकल जाता है .

परन्तु यह गुण सफेद अपराजिता में विशेष रूप से है, ऐसा तत्कालीन वैद्यों का मत था.

सुश्रुत संहिता में दर्विकर सर्पों के दंश की  चिकित्सा में अन्य द्रव्यों और वनस्पतियों के साथ देने का विवरण है. चरक संहिता में दर्विकर सांप के काटने पर निर्गुण्डी की जड़ की छाल और अपराजिता की जड़ की छाल को जल के साथ पीसकर पिलाने के लिए कहा गया है . अर्थवेद में भी इसे बज, कौडिये और चितकबरे साँपों एवं बिच्छु के विष को नष्ट करने वाला बताया गया है .

वैद्य लोग  इन नुस्खों पर चिकित्सा करके कई लोगों के जान बचा रहे थे, पर सर्प विष चिकित्सा में इसके प्रभाव की पुष्टि आधुनिक डॉक्टरो द्वारा नहीं हो पाई.उन्होंने इसका मानव शरीर पर परिक्षण नहीं किया और केमिकल एनालिसिस में इसे सर्पविष में निरुपयोगी पाया गया .लेकिन कई डॉक्टरो की राय थी कि केमिकल एनालिसिस से किसी वनस्पति के सभी प्रभावों का विश्लेषण संभव नहीं .

हमारी राय यह है की यदि आप जंगल में है .किसी देहात में है  . वहां निर्गुण्डी या यह वनस्पति है , तो प्रारंभिक चिकित्सा के तौर पर इसका प्रयोग करें और विकल्प अधिक विश्वसनीय है , तो उसे लें .

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