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अपना सामान्य फल देखने के लिए क्या करें?

अपना भाग्य स्वयं जानने के कुछ  सरल तरीके.

केवल कुछ सामान्य सूत्रों को समझकर आगे राशि-ग्रह के अलग अलग फलों को पढ़कर समरी बना लें। समरी का सूत्र निम्नलिखित होगा।

किसी भाव (खाना) के विषय को पूर्व के विवरण से समझ लें। ये संक्षिप्त विवरण है। इनमें केवल सब्जेक्ट का नाम है, उस सब्जेक्ट का विस्तार नहीं। उसका विस्तार स्वयं आपको करना होगा।विस्तार के लिए ढेर सारा दायरा होता है। इसमें थोडा मस्तिष्क लगाना होगा। ‘राजयोग’ का यह अर्थ नहीं है कि राजा बन जायेंगे। उच्च प्रशासनिक सैनिक पुलिस पद, नेता गिरी , किसी बड़ी संस्था या व्यवसाय का हुकुमत , अधिकार , धन भी ‘राजयोग’ ही होता है। यह किस प्रकार पता चेलगा कि वह किस तरफ होगा? इसका निर्णय अन्य खानों के ग्रहयोग, दृष्टि प्रभाव आदि से होता है।

हमने संक्षिप्त सूत्र बनाने के लिए केवल राशि प्रभाव, ग्रह-प्रभाव, भाव प्रभाव, सातवी दृष्टि प्रभाव लिया है। इतने से ही बहुत कुछ ज्ञात होता है। इतना कुछ जो प्रोफेशनल ज्योतिषी भी नहीं बताते। अधिकतर फल सरसरी नजर निकाले जाते है। गणना की ही नहीं जाती। आप स्वयं यह समझों कि यह गणना कैसे जाती और शास्त्रीय विवरणों को थोड़ी देर के लिए भूल जाएँ।

आपको करना क्या है ?

करना यह है कि किसी खाने में जो राशि है और जो ग्रह है; उसकी स्थिति वहां क्या है, यह देखना है। भाव के स्वामी ग्रह होते है और राशियों के स्वामी ग्रह होते है, और उस भाव या खाने में स्थित ग्रह भी होता है। इन तीनों की शत्रुता – मित्रता को ग्रहों की शत्रुता- मित्रता से देखें कि इसका शुभ-अशुभ दशा क्या है? जैसे – भाव एक का स्वामी सूर्य है । यहाँ सूर्य सर्वोच्च होता है, मंगल भी उच्च होता है, शनि सूर्य का प्रबल शत्रु है, इसलिए वह यहाँ हो तो नीच हो जाता है; लेकिन सूर्य कहीं भी प्रबल हो रहा हो, तो यह नीच शनि भी शुभ प्रभाव ही देता है। इसके बाद भी शनि की कुटिलता, क्रूरता, न्याय प्रियता आदि बनी रहित है। धार्मिक या ख्याति प्राप्त होते हुए भी यह शनि छुपकर काम करने और अपना आंतरिक भेद न प्रकट करने की प्रवृति नहीं छोड़ता। यहाँ बृहस्पति किओ राशि हो, तो उसमें हुकुमत , दबंग प्रवृति, गंभीरता आदि का गुण होगा। बृहस्पति कुंडली में नीच या पापी बुध के साथ विकार युक्त हो रहा हो, तो पाखंडी, छली, ज्ञानी होते हुए भी लालची होगा। वह जज भी बन जाए, तो घूसखोर होगा।

अब इन तीनों के समीकरण पर एक और समीकरण काम करता है । दृष्टि का समीकरण । ये दृष्टियाँ बहुत तरह की है; पर विस्तार भय से हमने केवल परस्पर सातवीं , दृष्टि को लिया है। हमारे इन विवरणों में बहुत सी बाते पारम्परिक ज्योतिष से कुछ अलग हटकर है; क्योंकि आचार्यों का विषय-फल आदि में मतैक्य नहीं है। थोडा-थोडा अंतर हर जगह है। हमने उसे एकाकार करने की कोशिश की है और व्यवहारिक भी, जिससे सामान्य व्यक्ति इसका लाभ उठा सके।

उपर्युक्त प्रकार से ही चन्द्र कुंडली का भी फल ज्ञात किया जा सकता है। माना यह जाता है कि चन्द्र कुंडली का अध्ययन वैवाहिक दशा को ज्ञात करने के लिए किया जाता है; पर लग्न कुंडली और चन्द्र कुंडली दोनों को एक –दूसरे का पूरक समझना ही ठीक होगा। केवल लग्न कुंडली से भी सब कुछ ज्ञात किया जा सकता है। इसका गणित सीधा जोड़-घटाव नहीं है। ‘भाव’ विषय को स्पष्ट करता है, तो राशी वहां के वातावरण को, ग्रह बीज है – इस प्रकार भविष्य रुपी बी वृक्ष का स्वरुप ज्ञात किया जाता है। इस वृक्ष को अगल-बगल का वृक्ष कहाँ कदबा रहा है , कहाँ उत्प्रेरक बन रहा है, यह जानना ‘दृष्टि’ है। यह तीसरी , पांचवी , सप्तमी आदि है। यहाँ केवल सातवीं दृष्टि ली गयी है। क्योंकि पूरी दृष्टि यह माने जाती है। मंगल की दृष्टि 4 वें एवं 8 वें पर, गुरु की पांचवें एवं नवमें पर, शनि की तीसरे एवं दसवें पर भी पूरी दृष्टि मानी जाती है

 

ग्रहों के सम्बन्ध

इसे चार्ट की अपेक्षा वस्तुपरक ढंग से समझना चाहिए।

सूर्य प्राण ऊर्जा का उत्पादन केंद्र है , तो मंगल आग यानी गर्मी। शरीर में इसका उत्पादक सूर्य है। इसलिए ये दोनों पूरक है, मित्र है। चन्द्रमा सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित है, इसलिए ये दोनों भी मित्र है। शरीर का चन्द्रमा शरीर के सूर्य को ईंधन देता है और सूर्य चन्द्रमा को ईंधन प्राप्त करने की शक्ति। मंगल-चन्द्रमा में चंद्रमा यानी पानी गर्म होता है। यह उसे प्रताड़ित तो करता है, पर उपयोगी भी बनाता है। मंगल की गर्मी चन्द्रमा की ठंडक से सौम्य होती है।लाल किताब में इसी दूध और शहद का मेल कहा गया है। सूर्य की किरणों से बुध यानी पौधा या हरियाली बढती है, तो जल भी जाती है। अतः इनका सम्बन्ध इस पर पड़नेवाली अन्य प्रभावों के अनुरूप होता है। चन्द्रमा के साथ भी बुध का यही समन्वय है। अधिक पानी , बुध, बर्बादी , ठीक पानी बुध की हरियाली, पानी का अभाव बुध की दशा ख़राब । पर सामान्यतया सूर्य का संयोग न होने या चन्द्रमा के विकार युक्त होने पर यह सम्बन्ध अशुभ ही बन जाता है। चंद्रमा निर्मल रहा, सूर्य का संयोग रहा; तो तमाम प्रकार की नई-नई कल्पनाएं आदि में इस योग का ही प्रभाव होता है। मंगल – बुध का सम्बन्ध अशुभ ही होता है। आग और हरियाली का जंगल । यह धुंआ पैदा करता है और डीएम घोंटता है, प्रलय मचा देता है। भले ही सूर्य के योग से प्रशासक –सेना अधिकारी या पुलिस ही क्यों न हों।

सूर्य नाभिक है; बृहस्पति वायुमंडल । सूर्य की ऊर्जा इसी स्रोत से बढती है। इसलिए दोनों मित्र है। चन्द्रमा की शक्ति से ( यह सिर का चाँद है) बृहस्पति अर्थात श्वांस की शक्ति बढती है। इससे सूर्य प्रज्वलित होता है, जो चंद्रमा की शक्ति बढाता है। इसलिए ये भी आपस में मित्र है। मंगल आग है, बृहस्पति हवा। यह मंगल का मित्र है; परन्तु दोनों का संयोग शुभ ही हो या आवश्यक नहीं है। हवा का जोर मंगल को अनियंत्रित करता है और यह विनाशकारी भी हो सकता है। बुध-बृहस्पति का झगड़ा जग जाहिर है। एक व्यवहारिक बुद्धि है, जो फल प्राप्ति में किसी प्रकार का अंकुश नहीं चाहती, एक परम्परागत विवेक है, जो संस्कारों और मर्यादा के विरुद्ध काम करने से रोकता है। बुध एक गुब्बारा ,जो हवा को कैद करके अपना अस्तित्त्व बनाता है। इसमें बृहस्पति घुटना है। इससे श्वांस , नाक आदि के रोग , कुंठा आदि भी उत्पन्न होते है। इसके बाद भी दोनों का संयोग हमेशा बुरा नहीं होता। बृहस्पति के संयोग में बुध सृजन करता है । बृहस्पति का संयोग न मिले, तो यह स्वयं अशुभ हो जाता है। एक पिलपिला गुब्बारा जिसमें हवा की कमी है।

सूर्य की प्रखरता शुक्र की मिट्टी को पकाती है। शुक्र बर्बाद होता है। चंद्रमा संतुलित हो, अच्छा हो, तो फसल की सिंचाई होती है अन्यथा बाढ़ , जो मिट्टी को किसी अकाम का रहने नहीं देती। अत्यधिक कल्पना और भावुकता शुक्र को नष्ट कर देती है। मंगल सूर्य की गर्मी है। सूर्य की किरणें। यह शुक्र को उपयोगी बनाता है, पर यही इसको जलता भी है। स्त्री शुक्र है , मंगल उसके लिए शुभ समझा जाता है। क्योंकि यह गर्मी , राहत दबाब आदि का भी प्रतिक है ; परन्तु यही उसे क्रूर , ईर्ष्यालु और दूसरों को जलानेवाला भी बनाता है । स्त्री- पुरुष दोनों अपने शुक्र (शरीर, जीवन साथी और संसार को विकृत करने वाले बन जाते है । बुध और शुक्र – मिट्टी और वनस्पति – शरीर और बुद्धि एक-दूसरे के पूरक है। बृहस्पति से शुक्र की मिट्टी उडती है , आँख-नाक-मुंह में पड़कर पीड़ा पहुंचाती है।

शनि-शक्ति है। यह सूर्य की ऊर्जा को खींचकर उसे निस्तेज करती है । चंद्रमा , सूर्य, शनि का संतुलित रूप हो , तो हड्डी , खून, बाल सभी निर्मल होते है। इनका संतुलन हो , तो जीवन में रौशनी बढ़ जाती है । शनि मंगल का संयोग का अर्थ है गर्म पत्थर का लावा या धारदार हथियार , आग्नेयास्त्र , यह विध्वंसक होता है, पर सूर्य का योग मिले तो विध्वंसक होते हुए भी राजा, राज्याधिकारी, सेना और पुलिस के पद पर प्रतिष्ठित करता है।

राहु चंद्रमा की ऊर्जात्मक शक्ति है; जो शिव की जटाओं में बहती है। यह + है । केतु – बिंदु है यानी पूँछ की जड़। धरती से लगी होने के कारण पैर भी यही माना जाता है। + में विकार हो , तो नाभिक यानी सूर्य में विकार होता है; – यानी केतु में विकार हो , तो + की आपूर्ति और व्यवस्था खराब हो जाती है। +, – में विकार हो , तो समस्त ऊर्जा उत्पादन बिंदु विकृत हो जाते है। जो दशा इस काल में बिजली के उपकारों की हो सकती है, वही शरीर के ग्रहों की होती है। केतु शनि प्रवाह से उत्पन्न होता है, राहु भी शनि की दशा पर निर्भर करता है।

इस प्रकार देखेंगे, तो यह ज्ञात होगा कि एक ग्रह खराब हो , तो कई को ख़राब कर देता है। सभी एक दूसरे से सम्बन्धित होते है; इसलिए कुंडली के एक-दो खाने से सभी फल की गणना नहीं करनी चाहिए।

 

 

कुंडली के ग्रह : मित्रता – शत्रुता – स्वामित्त्व आदि – अगली पोस्टिंग

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